मुख्यपृष्ठस्तंभकाहें बिसरा गांव : सखियन के बात निराली

काहें बिसरा गांव : सखियन के बात निराली

पंकज तिवारी

‘कइयउ बरिस के बाद जाइके बियाहे जोगा लड़िका मिलि पाए बाऽ। मन एतना मगन बाऽ कि का बताई? मना नाचि-नाचि के घूमई चाहत बाऽ मुला सब कहथेन कि नेक कामें में नजरउ बहुत जल्दी लागथऽ यंह से जादा तमाशा न कइ कराइ के बस तिलके, बरिक्छा, बियाहे क तैयारी करज्जा। घर, बर, परिवार कुलि एक नम्मर मिलि गवा बाऽ। बियाहउ बहुत धूमधाम से करब कि देखवइयउ एक बार दंग रहि जांइ। हउ कि नाइ बुढ़ऊ…?’
‘हां… हां… अउर का बूढ़ा… तूं जवन-जवन कहबू कुलि होए हो। नतिनी के बियाह हउ शान-शौकते में कवनउ कमीऽ न होइ पाये होऽ बूढ़ाऽ।’
‘बसि-बसि अइसइ ललकारे रह्यऽ बसि, बाकी त हम कुलि निपटायेनि चलब।’ दादी ने कहा।
सभी के चेहरे पर खुशी झलक उठी। ददा अब चलने को हुए कि दादी फिर बोल उठी- ‘अरे त सब गोलियान हयेन रचि के इंहीं लागेन बताइ देतऽ नाइ कि लड़िकवा कइसन बाऽ?’
‘हां… हां… जरूर…’ ददा अपने टेटे में हाथ डालकर लगे देखने पर टेट तो खाली…।
‘अरे रे फोटुइया त उंहीं रहिग लागत बाऽ।’
‘बाह रे बुढ़ऊ… धन्नि हयऽ तोहंऊं, रचि के फोटो देखिके समझाइ त जात कि देखइ में कइसन बा लड़िकवा। जाइद अच्छऽ, वोइसइ बताइदऽ कुछ ओकरे बारे में’- दादी बोलीं।
‘हां… जरूर… देखऽ लड़िका बहुतै शांत, शालीन, सभ्य बाऽ। देखै में त बहुतै शौखीन बाऽ। आज तक हम जेतना लड़िका देखे ह अइसन एक्कौ नाइ रहेन। ससुर बेचारा त हीराऽ बाऽ। ससुइया के त नाइ जानि पाये कइसन बा मुला घर, दुआर, परिवार कुछु कटइ लाया नाइ बाऽ। हां लड़िकवा पढ़इ में कुछ कमजोर देखान हऽ बसि…’- ददा इतना बोलकर शांत हो गए। रुपाली जो मन ही मन मगन हो रही थी पढ़ाई का नाम आते ही दुखी हो गई और मन ही मन सोचने लगी- ‘केतना बढ़िया होइ जात अगर पढ़इउ में रचि क तेज रहा होतेन त…’
‘कुछ कहे हऽ का बिटियवा…?’ ददा बोले।
‘नाहीं… नाहीं… बाबू हम त कुछु नाइ बोले हऽ…’ सकपकाते हुए बोल पड़ी नातिन, लजा गई रुपाली।
‘एक बात बाऽ हो बूढ़ा… हमइ त एस लाग हऽ कि उ पढ़इ कमजोर नाइ बलुक बोलइ में संकोच करत रहाऽ बाकी आवथऽ कुलि ओकरे। चल जाइदऽ कुलि। अब चलज्जा तैयारी में लगि जाज्जा। हमहूं चलीऽ रचिके भंइसियन के कोयेर-पानी कइ लेई’, कहते हुए ददा बाहर निकल गए। इधर मम्मी भी खुश हो गई थीं और बिटिया के माथे को चूमते हुए रुपाली को गले से लगा ली।
‘चलीऽ बिटिया हमहूं पहिले त चउरा माई के परसाद चढ़ाइ देई, गांउ वालेन के बंटवाइ देई अउर महराज के घरे जाइके तोहरे बापे के फोन कइके बियाहे क खबर सुनाइ आई तब कतंउ जाइके हमार जिउ धिरा होए, अब त जनतइ हऊ कि काम बढ़ि गवाऽ बा। ओइसइ कइ रुपिया लागे रे फोनवा में’- कहते हुए दादी अपनी तिजोरी के तरफ मुड़ गई थीं।
रुपाली भी अपनी खुशी नहीं छिपा पा रही थी और दौड़कर सखी सुगनी के यहां पहुंच गई। सुगनी, मुनिया, कलउतिया दुआरे इनारा पर बैठ मस्ती में झूमती बासन मांज रही थीं। जामुन के पत्ते छितराए हुए थे। हवा भी मस्त मगन रुपाली के खुशी में शामिल हो जैसे। दूसरे तरफ इनारा पे कई लोग बैठे गपिया रहे थे। रुपाली को देखते ही सुगनी बोल पड़ी- ‘अरे सखी… तूं इंहां…? सब ठीक त बाऽ नऽ…?’
‘हां रे सखी… सब ठीक बाऽ…’, कहते हुए रुपाली सुगनी के पास तक पहुंच गई और उसके दोनों कंधों को पकड़कर उचकाने लगी। सुगनी गिरते-गिरते बची।
‘अरे… अरे… सखियवा अइसन कवन बात बाऽ रेऽ कि सम्हारे नाइ सम्हरत बाऽ’ खुद को गिरने से बचाने हेतु दहिना हाथ जमीन पर टिकाते हुए सुगनी बोल उठी।
‘अरे अइसनइ बात बा रे सखीऽ… बस तंइ जल्दी से बासन मांजु जहिया चलि के बतियावा जाइ। आज खुशी बहुत बंढ़ियलकी बा। तिनहउ जने सथवंइ चिहुंकि के देखै लागत गइन रुपाली के।

(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)

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