‘साया’, ‘घरवाली ऊपरवाली’, ‘कुसुम’ जैसे सफल शो में मुख्य किरदार निभाकर वाहवाही बटोरनेवाली मानसी जोशी ‘जी’ टीवी के शो ‘लक्ष्मी निवास’ में लक्ष्मी का किरदार निभा रही हैं। एक मध्यम वर्गीय परिवार की भावनात्मक रीढ़ के रूप में लक्ष्मी उन अनगिनत महिलाओं का प्रतिनिधित्व करती है, जिनकी ताकत अक्सर अनदेखी रह जाती है, लेकिन गहराई से महसूस की जाती है। पेश हैं, मानसी जोशी से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
– शो ‘लक्ष्मी निवास’ स्वीकार करने की क्या वजह रही?
‘लक्ष्मी निवास’ एक मध्यम वर्गीय दंपति लक्ष्मी और श्रीनिवास की मार्मिक कहानी है, जिन्होंने ३५ वर्ष किराए के घर में बिताए और सेवानिवृत्ति नजदीक आने पर अपना खुद का घर खरीदने के सपने को पूरा करने की ओर अग्रसर हैं। यह एक ऐसी कहानी है, जिससे हर भारतीय परिवार जुड़ाव महसूस करेगा, जहां आर्थिक चुनौतियां, पारिवारिक अपेक्षाएं और एक-दूसरे के प्रति प्रेम है। इस आकांक्षा के अलावा यह कहानी पति-पत्नी के बीच अटूट रिश्ते को भी खूबसूरती से दर्शाती है, जिन्होंने जीवन के हर पड़ाव पर एक-दूसरे का साथ दिया है।
-क्या आज के समय में ऐसी कहानियां महत्वपूर्ण हैं?
आज की तेज रफ्तार दुनिया में हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि घर खरीदना या अपने परिवार को खुशहाल देखना जैसे सपने आज भी कई लोगों के लिए सफलता के सच्चे मापदंड हैं। लक्ष्मी निवास भारत के मध्यम वर्गीय जीवन की झलक दिखाता है, जहां लोगों के पास भले ही धन प्रचुरता न हो, लेकिन वे कृतज्ञता, ईमानदारी और एकजुटता के साथ जीवन जीते हैं। यह एक ऐसी कहानी है जो वास्तविक लोगों, वास्तविक संघर्षों और वास्तविक भावनाओं का जश्न मनाती है।
-लक्ष्मी की भूमिका के लिए किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
सच कहूं तो लक्ष्मी और मैं एक-दूसरे से बिलकुल अलग हैं। मैं स्वभाव से आधुनिक और मुखर हूं, जबकि लक्ष्मी मृदुभाषी, पारंपरिक और पारिवारिक मूल्यों में गहरी आस्था रखनेवाली है। एक समानता यह है कि लक्ष्मी अपने परिवार के लिए जान न्योछावर करती है तो मेरे लिए भी मेरा परिवार ही सब कुछ है।
-शो ‘लक्ष्मी निवास’ मराठी शो की हूबहू कॉपी है?
सच तो यह है कि शो ‘लक्ष्मी निवास’ मूलरूप से कन्नड़ भाषा से शुरू हुआ। कन्नड़ से मराठी भाषा में यह शो ‘जी’ पर शुरू हुआ और जब इसे हिंदी में करने की बात हुई तो हिंदी के लेखकों ने हिंदी के कल्चर, भाषा और रीति-रिवाजों को ध्यान में रखते हुए उसमें बदलाव किए। जब इस शो का मुझे ऑफर मिला तो मैंने सबसे पहले मराठी वाला शो देखा।
– करियर के बीच ब्रेक लेने की कोई खास वजह?
मैंने अपने करियर में हर शो के बाद अक्सर ब्रेक लिया है। मैं यह कभी नहीं चाहती कि मैं साल के ३६५ दिन काम करती रहूं। मैं हर ऑफर तब तक नहीं स्वीकार करती जब तक कोई अर्थपूर्ण किरदार या अच्छा रोल मुझे ऑफर नहीं होता, फिर चाहे वो फिल्म हो या टीवी।
– टीवी और फिल्म इंडस्ट्री में हुए बदलावों को आप कैसे देखती हैं?
मैं अभिनय से इसलिए जुड़ी क्योंकि मेरे पिता अरविंद जोशी लेखक, निर्माता और निर्देशक थे। उनका अभिनय प्रेम, हुनर हम दोनों भाई-बहन को विरासत में मिले। मैं और मेरा छोटा भाई शर्मन जोशी बरसों से काम कर रहे हैं। मुझे संघर्ष नहीं करना पड़ा। ४० वर्षों के इस करियर में कई बदलाव हुए, जो स्वाभाविक हैं।
– शोज के ‘लॉन्ग वर्किंग आवर्स’ में काम करना तकलीफदेह नहीं होता?
यह दिक्कत तो है ही। ओटीटी, फिल्म, नाटक और टीवी सभी का बजट अलग-अलग होता है। डेली सोप में कम समय में पूरा एपिसोड तैयार करना निर्माता और प्रोडक्शन टीम का काम होता है। शूटिंग लोकेशन पर आने-जाने में दो से ढाई घंटे लगते हैं। इसके लिए सुबह जल्दी घर छोड़ना पड़ता है और रात को घर आते-आते काफी लेट हो जाता है। इस रूटीन में कोई और विकल्प तो है नहीं। मुझे लगता है अभिनय से प्यार के चलते कलाकार इन दिक्कतों को नजरअंदाज कर देते है, लेकिन चाहते तो सभी हैं कि काश वर्किंग आवर्स थोड़े कम हो जाएं।
