प्रो. दयानंद तिवारी
यह प्रश्न आज लगभग हर साहित्यिक गोष्ठी, संगोष्ठी और संपादकीय चर्चा का हिस्सा बन चुका है कि क्या नई पीढ़ी साहित्य से दूर होती जा रही है। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, ओटीटी प्लेटफॉर्म, रील्स और त्वरित मनोरंजन के इस दौर में यह चिंता स्वाभाविक भी प्रतीत होती है। अक्सर यह मान लिया जाता है कि स्क्रीन-संस्कृति ने पुस्तक-संस्कृति को पीछे धकेल दिया है। किंतु यदि हम सतह के नीचे उतरकर, पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर देखें, तो यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि नई पीढ़ी साहित्य-विमुख हो गई है। सच यह है कि दूरी नहीं बढ़ी है, संवाद के माध्यम, गति और स्वरूप बदल गए हैं।
परंपरागत रूप से साहित्य का संबंध पुस्तक, पत्रिका, मंच, पाठशाला और संवाद सभाओं से रहा है। नई पीढ़ी ने इन पारंपरिक माध्यमों के स्थान पर डिजिटल मंचों को अपनाया है। आज कविता इंस्टाग्राम की पोस्ट में है, कहानी ब्लॉग और वेब-पत्रिकाओं में सांस ले रही है और वैचारिक विमर्श पॉडकास्ट व वीडियो के माध्यम से अभिव्यक्त हो रहा है। यह परिवर्तन साहित्य के अंत का संकेत नहीं, बल्कि उसके विस्तार और रूपांतरण का प्रमाण है। साहित्य अपनी आत्मा को सुरक्षित रखते हुए नए रूप में जीवित है। नई पीढ़ी का यथार्थ भी भिन्न है। उसकी समस्याएं, संघर्ष और सपने अलग संदर्भों में आकार लेते हैं। बेरोजगारी, तीव्र प्रतिस्पर्धा, पहचान का संकट, अकेलापन, संबंधों की जटिलता, मानसिक स्वास्थ्य, पर्यावरण की चिंता और सामाजिक असमानता, ये सभी उसके जीवन और लेखन के केंद्र में हैं। वह साहित्य को केवल सौंदर्य-बोध या मनोरंजन के लिए नहीं पढ़ना चाहता, बल्कि अपने जीवन के प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए उससे जुड़ता है। इसलिए उसे वही साहित्य आकर्षित करता है, जो उसके समय की सच्चाई को ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करता है। अक्सर यह कहा जाता है कि नई पीढ़ी धैर्यहीन है और गंभीर साहित्य पढ़ने का समय या क्षमता नहीं रखती। यह कथन आंशिक रूप से सत्य हो सकता है, किंतु यह संपूर्ण सत्य नहीं है।
वास्तविकता यह है कि उसकी संवेदनशीलता कम नहीं हुई है, वह केवल औपचारिकता और अप्रासंगिकता से दूरी बनाती है। यदि विषय उसे छूता है, तो वही युवा सौ-सौ पन्नों का उपन्यास भी पढ़ लेता है, कठिन कविताओं पर विमर्श करता है और वैचारिक लेखन से गहरे स्तर पर जुड़ता है। समस्या लंबाई नहीं, जुड़ाव की है। आज आवश्यकता इस बात की है कि साहित्यकार और आलोचक आत्ममंथन करें। क्या हम आज भी वही भाषा, वही शिल्प और वही विषय दोहराए जा रहे हैं, जो दशकों पहले प्रासंगिक थे? क्या हमारी आलोचना नई पीढ़ी को समझने का प्रयास करती है, या उसे नकार कर स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने में लगी रहती है? साहित्य का स्वभाव मूलत: संवादात्मक रहा है। जब यह संवाद एकतरफा हो जाता है, तब दूरी का भ्रम पैदा होता है और वही भ्रम धीरे-धीरे शिकायत का रूप ले लेता है।
शिक्षा व्यवस्था की भूमिका भी इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में साहित्य को प्राय: परीक्षा, अंकों और पाठ्यक्रम तक सीमित कर दिया जाता है। इससे साहित्य का जीवंत, प्रश्नात्मक और संवेदनात्मक रूप छात्रों के सामने नहीं आ पाता। यदि साहित्य को जीवन से जोड़कर चर्चा, नाट्य-पाठ, रचनात्मक लेखन, वाद-विवाद और संवाद के माध्यम से पढ़ाया जाए, तो नई पीढ़ी उससे कहीं अधिक गहराई से जुड़ेगी। पाठ्यक्रमों में समकालीन रचनाओं और युवा लेखकों को स्थान देना भी समय की अनिवार्यता है। डिजिटल युग ने साहित्य को अधिक लोकतांत्रिक बनाया है। अब अभिव्यक्ति के लिए किसी प्रकाशक की चौखट अनिवार्य नहीं रही। हर युवा अपनी बात कह सकता है, अपनी रचना साझा कर सकता है। यह स्थिति एक ओर गुणवत्ता की चुनौती प्रस्तुत करती है, तो दूसरी ओर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विस्तार भी करती है। ऐसे समय में वरिष्ठ लेखकों, संपादकों और आलोचकों की भूमिका और अधिक जिम्मेदार हो जाती है। उन्हें मार्गदर्शन करना है, संवाद बढ़ाना है, न कि हतोत्साहित करना। नई पीढ़ी प्रश्न करती है, असहमति जताती है और नए मूल्यों की तलाश में रहती है। साहित्य भी तो मूलत: यही करता आया है। इसलिए दोनों के बीच विरोध नहीं, बल्कि स्वाभाविक साम्य है। आवश्यकता केवल इतनी है कि साहित्य समय से पीछे न चले, बल्कि उसके साथ कदम मिलाकर चले, उसकी भाषा सुने, उसके प्रश्न समझे और उसके अनुभवों को अभिव्यक्ति दे।
अंतत: यह स्पष्ट है कि नई पीढ़ी साहित्य से दूर नहीं है। वह अपने समय का, अपनी भाषा का और अपनी संवेदना का साहित्य चाहती है। यदि हम साहित्य को संग्रहालय की वस्तु बना देंगे, तो वह नई पीढ़ी के लिए अप्रासंगिक हो जाएगा। किंतु यदि हम उसे जीवन की धड़कनों से जोड़ेंगे, तो वही युवा उसका सबसे बड़ा संवाहक बनेगा। साहित्य शलाका का यह कोना हमें यही सिखाता है कि साहित्य तभी जीवित रहता है, जब वह समय से संवाद करता है। और आज का समय नई पीढ़ी है।
(लेखक आचार्य एवं शोध निदेशक, श्री जे.जे.टी. विश्वविद्यालय व सुप्रसिद्ध शिक्षाविद, साहित्यकार एवं राष्ट्रवादी विचारक है)
