मुख्यपृष्ठस्तंभपड़ताल : महाराष्ट्र में १,९०० करोड़ का अधूरा ‘स्मार्ट’ सपना!

पड़ताल : महाराष्ट्र में १,९०० करोड़ का अधूरा ‘स्मार्ट’ सपना!

–केंद्र ने हाथ खींचे राज्य पर अधूरे प्रोजेक्ट का बोझ

– खाली खजाने पर बढ़ा है और दबाव

-पिंपरी-चिंचवड से ठाणे तक ‘स्मार्ट’ सिर्फ कागजों में

धीरेंद्र उपाध्याय

१० साल, तीन बार बढ़ी डेडलाइन और हजारों बैठकों व प्रेजेंटेशन के बाद स्मार्ट सिटी मिशन विदा हो रहा है, लेकिन महाराष्ट्र के हिस्से में सवालों का अंबार छोड़ गया है। केंद्र ने साफ शब्दों में हाथ खींच लिए हैं। इसके तहत न विस्तार, न नई स्कीम को दिया गया। इससे अधूरे प्रोजेक्ट का पूरा बोझ सीधे राज्य के कंधों पर आ गिरा है। इस वजह से राज्य में १,९०० करोड़ रुपए के काम अधूरे हैं, जबकि सरकारी दावे ‘स्मार्ट’ उपलब्धियों से भरे पड़े हैं। हकीकत यह है कि राज्य का खजाना पहले से खाली है और उस पर अधूरे प्रोजेक्ट पूरा करने का नया दबाव जुड़ गया है। आलम यह है कि पिंपरी-चिंचवड से ठाणे तक स्मार्ट सिटी का सपना जमीन पर उतरने से पहले ही कागजों में सिमटता दिख रहा है। महायुति के शासन में यह सिर्फ एक योजना की नाकामी नहीं, बल्कि यह शहरी नागरिकों के भरोसे की हार है।
देश के १०० शहरों को स्मार्ट बनाने का सपना अब फाइलों में सिमटता दिख रहा है, लेकिन असली तस्वीर यह है कि १० साल और तीन बार डेडलाइन बढ़ने के बावजूद ८४ शहरों में हजारों करोड़ के काम अधूरे हैं। इस अधूरेपन की सूची में महाराष्ट्र सबसे ऊपर है, जहां १,८९८ करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट अधूरे पड़े हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि मिशन के तहत देशभर में ९३ फीसदी प्रोजेक्ट पूरे हुए, लेकिन महाराष्ट्र में कहानी अलग है। पिंपरी-चिंचवड़, सोलापुर और ठाणे जैसे औद्योगिक शहरी इलाकों में अब भी प्रोजेक्ट लटके हैं। सवाल यह है कि देश की आर्थिक राजधानी के राज्य में योजनाएं सबसे ज्यादा क्यों अटकीं?
क्यों फंसा महाराष्ट्र?
सूत्रों के मुताबिक, तीन बड़े कारण सामने आते हैं। इसमें पहला भूमि अधिग्रहण का पेंच सबसे अहम है। कई शहरों में जमीन पर कानूनी विवाद और स्थानीय विरोध ने काम रोका। दूसरा कारण एजेंसियों की नाकामी बना। इसमें समय पर सक्षम एजेंसी तय नहीं हुई और कई मामलों में ठेकेदार बदलते रहे। तीसरा कारण प्रशासनिक अस्थिरता है, जिसमें अधिकारियों के लगातार तबादलों से प्रोजेक्ट की रफ्तार टूटी।
उपलब्धियां बनाम अधूरापन
यह सच है कि सभी १०० शहरों में इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर बने, पानी-सफाई, स्मार्ट रोड और गवर्नेंस के ज्यादातर प्रोजेक्ट पूरे हुए। लेकिन महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य में सबसे ज्यादा रकम का अधूरा रह जाना स्मार्ट दावों पर सवाल खड़ा करता है।
राजनीति से परे सवाल
महाराष्ट्र में १,९०० करोड़ के अधूरे काम सिर्फ आंकड़ा नहीं, शहरी नागरिकों के हक का सवाल हैं। क्या स्मार्ट सिटी मिशन सिर्फ बोर्ड और प्रेजेंटेशन तक सीमित रह गया? या फिर जवाबदेही तय होगी और अधूरे प्रोजेक्ट जमीन पर उतरेंगे?
केंद्र का साफ संदेश, राज्यों की जवाबदेही
शहरी मामलों के मंत्रालय ने संसद में स्पष्ट किया है कि मिशन का न विस्तार होगा, न नया नाम यानी जो अधूरा है, उसे अब राज्यों और शहरों को अपने संसाधनों से पूरा करना होगा। केंद्र ने अपने हिस्से के लगभग सभी फंड जारी कर दिए। ऐसे में अब जवाबदेही सीधे राज्यों पर है।

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