सुनील ओसवाल
सिंहस्थ कुंभ मेले के नाम पर नासिक जिले में करोड़ों रुपए के विकास कार्य चल रहे हैं। सड़कें, पुल, घाट, सुरक्षा दीवारें- कागजों में हर तरफ तेज रफ्तार प्रगति। टेंडर निकले, वर्क ऑर्डर बांटे गए, बड़े-बड़े फलक खड़े कर दिए गए। लेकिन इसी चमकदार तस्वीर के भीतर एक बुनियादी सवाल दबा रह गया। इन कामों की गुणवत्ता की निगरानी आखिर कर कौन रहा है? इस सवाल को अचानक सतह पर ले आया कुंभमेला प्राधिकरण के अध्यक्ष व विभागीय आयुक्त डॉ. प्रवीण गेडाम का आकस्मिक निरीक्षण दौरा।
वाडीवर्हे में बेलगांव-कुर्हे-नांदुरवैद्य-साकूरफाटा मार्ग की जांच के दौरान डॉ. गेडाम ने जो किया, वह असल में रोज सार्वजनिक बांधकाम विभाग को करना चाहिए था। सड़क की परतों से सामग्री के नमूने उठवाए गए। मटेरियल टेस्टिंग वैन मौके पर बुलाई गई। प्रयोगशाला जाकर जांच के निर्देश दिए गए और रिपोर्ट तत्काल पेश करने का आदेश। यानी जो काम मुख्य अभियंता, कार्यकारी अभियंता और उप अभियंताओं की नियमित जिम्मेदारी थी, वह सीधे कुंभ प्राधिकरण के अध्यक्ष को खुद करना पड़ा। यहीं पहला असहज सवाल खड़ा होता है, नासिक सार्वजनिक बांधकाम विभाग के वरिष्ठ अधिकारी अब तक कितनी कुंभ परियोजनाओं के स्थलों पर वास्तव में गए? अगर नियमित निरीक्षण हुआ होता तो ‘अचानक गुणवत्ता जांच’ की नौबत ही क्यों आती? जमीनी हकीकत यह है कि त्र्यंबक रोड के वातानुकूलित दफ्तरों में फाइलें घूमती रहीं, टेंडर मंजूर होते रहे, बिल आगे बढ़ते रहे और जमीन पर क्या बन रहा है, उसकी फिक्र किसी ने नहीं की। मामला यहीं खत्म नहीं होता, बल्कि यहीं से यह और गंभीर हो जाता है।
सूत्र बताते हैं कि कुंभ कार्यों की गुणवत्ता टिके, इसके लिए निर्माण विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव ने नासिक सार्वजनिक बांधकाम विभाग के मुख्य अभियंता को अतिरिक्त प्रयोगशालाएं शुरू करने का स्पष्ट आदेश दिए था, लेकिन महीनों बीत जाने के बावजूद नई प्रयोगशाला अस्तित्व में नहीं आई यानी आदेश ऊपर से निकले और नीचे आकर दम तोड़ गए। यह अपने आप में भारी सवाल है। क्या मुख्य अभियंता ने इन आदेशों को गंभीरता से लिया ही नहीं? या फिर गुणवत्ता व्यवस्था जानबूझकर कमजोर रखी गई?
इसी पृष्ठभूमि में डॉ. गेडाम का खुद सड़क से नमूने उठाना, खुद वैन बुलाना और खुद प्रयोगशाला तक जाना, सिर्फ निरीक्षण नहीं, बल्कि पूरे तंत्र पर अविश्वास का दस्तावेज है और भी गंभीर सवाल विभाग की नासिक स्थित मौजूदा प्रयोगशाला को लेकर है, वह किसके अधीन है? वहां जिम्मेदार अधिकारी कौन है? रिपोर्ट किसके हस्ताक्षर से बनती है? और क्या वे रिपोर्टें कभी बिना देखे ही ‘ओके’ कर दी गर्इं,या जाती है?
कुंभ जैसे महाविशाल आयोजन में, जहां हर सड़क आनेवाले बारह वर्षों तक करोड़ों श्रद्धालुओं की आवाजाही का आधार बनने वाली है, वहां गुणवत्ता जांच की रीढ़ ही टूटी दिखाई दे रही है इसीलिए अब विभाग के भीतर ही खुसुर-पुसुर शुरू हो चुकी है। कुछ अधिकारियों का कहना है कि ‘करीबी’ ठेकेदारों के लिए रास्ते आसान किए गए और निगरानी को जानबूझकर ढीला छोड़ा गया।
डॉ. गेडाम के दौरे के बाद जब घटिया काम को लेकर नोटिस और पत्राचार शुरू हुआ है, तब सार्वजनिक बांधकाम विभाग में एक ही सवाल गूंज रहा है। कुंभ कार्यों में अब किसकी विकेट गिरेगी? क्योंकि यह किसी एक सड़क की कहानी नहीं है। यह उस सिस्टम की कहानी है, जहां इंजीनियरिंग से पहले ‘एडजस्टमेंट’ चलता है और गुणवत्ता से पहले ‘पेमेंट’।
कुंभ में करोड़ों श्रद्धालु आनेवाले हैं। उनका सफर सड़कों से होगा- फाइलों से नहीं और आज सवाल उद्घाटन पट्टिकाओं का नहीं है, सवाल उन सड़कों के भीतर दबी गुणवत्ता का है, जो नासिक सार्वजनिक बांधकाम विभाग के हर दरवाजे पर अब जोर से दस्तक दे रही है।
