मुख्यपृष्ठस्तंभफोकस : रेलवे का शर्मनाक सच

फोकस : रेलवे का शर्मनाक सच

-टीसी पिटते रहे, सिस्टम देखता रहा

-बिना टिकट यात्रा, खुलेआम आतंक

– रेलवे कर्मचारियों की सुरक्षा भगवान भरोसे

जेदवी

११ जनवरी २०२६ को थिरुवनंतपुरम-सीएसएमटी एक्सप्रेस में जो हुआ, उसने सिस्टम की पोल खोल दी। वरिष्ठ टीटीई श्यामू कल्लू राठौड़ और उनके सहयोगी अवनेश कुमार जब वॉशरूम के पास टिकट जांच कर रहे थे तो १५–२० बिना टिकट यात्रियों की भीड़ सामने आई। जुर्माना लगते ही पांच यात्रियों ने हमला बोल दिया। चलती ट्रेन से नीचे फेंकने की धमकी दी गई, हाथापाई हुई और सहयोगी टीटीई को थप्पड़ तक मार दिया गया। कल्याण स्टेशन पर ट्रेन रुकते ही आरपीएफ ने पांचों आरोपियों को गिरफ्तार किया। भारतीय न्याय संहिता की धाराओं में मामला दर्ज हुआ, लेकिन सवाल अब भी जिंदा है।
यह कोई अकेली घटना नहीं
१ जनवरी २०२६ में शिवड़ी स्टेशन पर फर्स्ट क्लास कोच में सेकंड क्लास टिकट पर यात्रा कर रहे यात्रियों ने टिकट चेकर की पिटाई कर दी। नालासोपारा में एसी फर्स्ट क्लास में बिना टिकट पकड़े जाने पर टीसी पर हॉकी स्टिक से हमला हुआ। बोरीवली स्टेशन पर तो हद ही पार हो गई, बिना टिकट पकड़े जाने के बाद एक यात्री ने टीसी कार्यालय में घुसकर तोड़-फोड़ की और कर्मचारियों से बदसलूकी की।
इन तमाम घटनाओं में एक बात समान है कि टिकट विवाद अब सीधे हिंसा में बदल रहा है। कई मामलों में हमले झुंड में किए गए। नतीजा यह कि ड्यूटी पर तैनात कर्मचारी खुद को असुरक्षित मान रहे हैं और रेलवे को मजबूरी में अतिरिक्त सुरक्षा लगानी पड़ रही है। रेलवे सुरक्षा बल और सरकारी रेलवे पुलिस का कहना है कि रेलवे कर्मचारियों पर हमला गंभीर अपराध है और किसी को बख्शा नहीं जाएगा। कई मामलों में अपराध दर्ज हैं, जांच चल रही है।
लेकिन सच्चाई यह भी है कि रेलवे ने टीसी-टीटीई पर हमलों का कोई ठोस आधिकारिक आंकड़ा आज तक सार्वजनिक नहीं किया। एफआईआर और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, पिछले एक साल में ऐसे ‘कई दर्जन’ मामले सामने आ चुके हैं। चर्चगेट से विरार लोकल से लेकर बोरीवली, नालासोपारा और लंबी दूरी की ट्रेनों तक।
जब इस बारे में वेस्टर्न रेलवे से सवाल किया गया तो जवाब और भी चौंकानेवाला रहा। रेलवे के मुताबिक, महीने में औसतन दो घटनाएं ऐसी होती हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर में एफआईआर दर्ज नहीं होती। कारण, आरोपी माफी मांग लेते हैं, लिखित में क्षमा याचना दे देते हैं और ‘यात्रियों के हित’ में मामला यहीं दबा दिया जाता है। रेल प्रशासन मानता है कि एफआईआर के बाद लंबी कानूनी प्रक्रिया में कई व्यावहारिक दिक्कतें आती हैं। सवाल सीधा है कि अगर टिकट जांच करनेवाला ही सुरक्षित नहीं है तो रेलवे नियमों का पालन आखिर कौन और वैâसे कराएगा?
रेलवे कर्मचारियों ने अब टीसी /टीटीई की सुरक्षा को ‘अत्यावश्यक श्रेणी’ में शामिल करने और टिकट जांच के दौरान स्थायी सुरक्षा बल की मांग तेज कर दी है। क्योंकि आज टिकट पूछना सिर्फ नियम पालन नहीं, सीधे जान से खेलने जैसा हो गया है।

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