हिमांशु राज
अकसर फिल्मों को चमक-दमक, लाल कालीन और कमाई के आँकड़ों तक सीमित कर दिया जाता है, लेकिन निर्माता चित्रा वकील शर्मा मानती हैं कि सिनेमा की असली शक्ति इससे कहीं गहरी है। निर्देशक–लेखक अनमोल महाजन की पुस्तक ‘द वॉल्ट ऑफ फ़िल्मोलॉजी’ का समर्थन करते हुए वह कहती हैं कि यह किताब फिल्म निर्माण को केवल रचनात्मक काम नहीं, बल्कि जीए हुए ज्ञान और अनुभव का स्वाभाविक विस्तार मानती है। चित्रा का मानना है कि सिनेमा केवल दृश्य और प्रसिद्धि नहीं, बल्कि अनुशासन, ज्ञान, सूक्ष्म अवलोकन, नैतिकता और मानवीय अनुभवों का समन्वय है। उनके अनुसार कोई भी फिल्म शून्य से नहीं बनती, वह इतिहास, मनोविज्ञान, राजनीति, विज्ञान, प्रबंधन और रोजमर्रा के जीवन जैसे अनेक विषयों से आकार लेती है। वह कहती हैं, “कक्षा में जो पढ़ते हैं, उसका सही अर्थ बहुत बाद में फिल्म के प्रकाश–स्थल पर समझ में आता है, वहीं सिद्धांत वास्तविकता में बदलता है।”यही बहु–विषयक दृष्टि ‘द वॉल्ट ऑफ फ़िल्मोलॉजी’ को उनके लिए विशिष्ट बनाती है। चित्रा के अनुसार यह पुस्तक परम्परागत फ़िल्म निर्माण मार्गदर्शिका नहीं, बल्कि जीवन का प्रतिबिंब है। बदलते रोज़गार के इस समय में यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न रखती है-क्या फिल्म निर्माण आपके पेशे से भागने का नहीं, बल्कि उसी की अगली सीढ़ी हो सकता है?यह पुस्तक उन कर्मी–वर्ग के लोगों से संवाद करती है, जो सृजनशील होना चाहते हैं, पर वर्षों की शिक्षा और अनुभव को त्यागने से हिचकते हैं। फिल्मोलॉजी उन्हें यह भरोसा देती है कि अब तक सीखा गया कोई भी ज्ञान व्यर्थ नहीं जाता। चित्रा को इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसका जमीन से जुड़ा सच कहना लगता है। वह मानती हैं, “यह न तो चकाचौंध को महिमामंडित करती है, न एक झटके में सफलता के स्वप्न बेचती है; यह प्रक्रिया, संरचना, अनुशासन और ज़िम्मेदारी की चर्चा करती है, जो आज दुर्लभ है।”अनमोल महाजन के विज्ञापन जगत के दीर्घ अनुभव से इस पुस्तक में स्पष्टता और तीक्ष्णता आई है। चित्रा के अनुसार वे सहज सृजनशीलता और संतुलित, क्रमबद्ध सोच के बीच सुंदर तालमेल बिठाते हैं। “वे जानते हैं कि सिनेमा पर व्यक्ति, समाज, बाजार और समय – चारों का प्रभाव पड़ता है, यही यथार्थधर्मी समझ इस पुस्तक को व्यवहारिक बनाती है,” वह कहती हैं।चित्रा मानती हैं कि ‘द वॉल्ट ऑफ फिल्मोलॉजी’ केवल उदीयमान फ़िल्मकारों के लिए ही नहीं, बल्कि शिक्षकों, अभियंताओं, प्रबंधकों, छात्रों और हर जिज्ञासु पाठक के लिए उपयोगी है। उनके शब्दों में, “सिनेमा जीवन से अलग नहीं, बल्कि उसी को व्यवस्थित कर, जांच-परख कर, सामूहिक प्रयास से हमारे सामने पुनः प्रस्तुत करने की प्रक्रिया है।” अनिश्चित समय में, उनके अनुसार, यह पुस्तक आसान रास्ता नहीं, बल्कि समझ प्रदान करती है और यही समझ आज सबसे बड़ी शक्ति है।
