पुलिस ने भगदड़ कराकर मारने की साजिश की
माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का हुआ अपमान
राजेश सरकार / प्रयागराज
मौनी अमावस्या पर प्रयागराज में पवित्र स्नान के लिए निकले ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के काफिले के साथ हुई प्रशासन और पुलिस की बर्बरता ने योगी सरकार के सुशासन, संवेदनशीलता और न्यायप्रियता की पोल खोल कर रख दी है। शंकराचार्य के काफिले को रोके जाने, स्नान न करने देने और शिष्यों को बाल खींचकर घसीटने, पीटे जाने और गिरफ्तार करने से साधु-संत ही नहीं हजारों श्रद्धालुओं में आक्रोश है। इस बर्बरता के विरोध में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने अन्न-जल त्याग कर न्याय की मांग की है।
उल्लेखनीय है कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने २०२५ में बीते महाकुंभ में भगदड़ में हुई मौत का मामला दबाए जाने संबंधी आवाज उठाई थी। कुछ लोगों ने ताजा बर्बरता को उसी का परिणाम बताया है। इस मामले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की खामोशी पर भी शक जताया जा रहा है, क्योंकि राज्य की कानून-व्यवस्था की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं पर होती है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के शिष्यों की पिटाई और गिरफ्तारी की घटना को लेकर विपक्ष, संत समाज और कई सामाजिक संगठनों ने सीधे तौर पर सरकार से जवाबदेही की मांग की है।
जूते से कुचला
जूते से कुचला है, बहुत बुरी तरह मारा गया है। दोबारा मारते तो मर ही जाता। ये कहना है ८५ साल के बुजुर्ग साधु का, जिन्हें बीजेपी सरकार की पुलिस ने बूटों तले रौंदा है। कल जब शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ दुर्व्यवहार किया गया, उस समय इस साधु की भी पिटाई की गई। ये शर्मनाक है। नरेंद्र मोदी को माफी मांगनी चाहिए।
दंडी संन्यासियों का सांकेतिक उपवास
प्रयाग माघ मेला क्षेत्र में मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज को माघ मेला क्षेत्र में प्रशासन द्वारा स्नान करने से रोकने व संतों सहित बटुकों के साथ प्रशासन द्वारा किए गए दुर्व्यवहार के विरोध में आज काशी में असि स्थित मुमुक्ष भवन में दंडी संन्यासियों ने सांकेतिक उपवास करके शंकराचार्य महाराज का समर्थन कियो।
मुख्यमंत्री की
नैतिक जिम्मेदारी
आलोचकों का मानना है कि यह घटना प्रशासनिक लापरवाही और अत्यधिक बल प्रयोग का उदाहरण है, जिसकी नैतिक जिम्मेदारी मुख्यमंत्री पर जाती है। योगी सरकार स्वयं को धर्म, संस्कृति और सनातन परंपरा की रक्षक बताती रही है, ऐसे में एक प्रतिष्ठित शंकराचार्य के शिष्यों के साथ दुर्व्यवहार की खबरें सरकार की उसी छवि पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। इसी कारण यह मामला केवल स्थानीय प्रशासन तक सीमित न रहकर सीधे मुख्यमंत्री के नेतृत्व और शासन शैली से जोड़कर देखा जा रहा है। लोकतंत्र में जवाबदेही का सिद्धांत यही कहता है कि शीर्ष नेतृत्व को स्पष्टीकरण देना ही होता है। इस प्रकरण ने योगी सरकार की ‘सख्त प्रशासन’ वाली नीति को दो धारी तलवार की तरह सामने ला दिया है।
