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 स्कैम्स एंड स्कैंडल : कमसिन बालाओं का सौदागर भाग-२ …शराब और शबाब के बीच बड़े-बड़े सौदे!

श्रीकिशोर शाही

न्यूयार्क का अपर ईस्ट। १९९६ की एक सुहानी शाम थी। जेफरी एपस्टीन अपने टाउनहाउस की खिड़की के पास खड़ा था। नीचे सड़क पर एक काली कार आकर रुकी। ड्राइवर ने उतरकर पीछे का दरवाजा खोला। एपस्टीन ने अपनी घड़ी देखी और उसके होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई। ‘लेट है’, वह बुदबुदाया।
कुछ ही देर में डोरबेल बजी। दरवाजा खुला। सामने एक अधेड़ उम्र का आदमी खड़ा था। महंगा सूट, चेहरे पर हल्की चिंता।
‘जेफ, मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है’, उसने अंदर आते हुए कहा।
‘वक्त किसी के पास नहीं है, लेकिन सबको कुछ न कुछ चाहिए जरूर’, एपस्टीन ने जवाब दिया।
वे ड्राइंग रूम में बैठे थे। यह कोई पार्टी नहींr थी इसलिए शराब नहीं, बल्कि कॉफी के साथ बातचीत होने लगी। ‘तो तुम्हें फंड चाहिए’, एपस्टीन ने बिना भूमिका के कहा।
वह आदमी चौंक गया!
‘मैंने ऐसा नहीं कहा!’
‘कहने की जरूरत भी नहीं है’, एपस्टीन ने बात काटते हुए कहा। ‘मैं तुम्हें सही लोगों तक पहुंचा सकता हूं।’
यही एपस्टीन का तरीका था। वह कभी खुद को केंद्र में नहीं रखता था। वह सिर्फ रास्ता बनाता और पैसे कमाता था। एपस्टीन ने इसके लिए एक आइलैंड पर शानदार विला बना रखा था, जहां पार्टियां होती। शराब, कबाब और शबाब के बीच बड़े-बड़े सौदे होते थे। कुछ महीनों बाद, फ्लोरिडा के पाम बीच में उसके दूसरे घर में चहल-पहल थी। बाहर दो कमसिन लड़कियां खड़ी थीं। वे असहज थीं। भीतर जाने से पहले एक महिला ने उन्हें धीमी आवाज में समझाया। ‘ज्यादा सवाल मत करना। जो कहा जाए, वही करना।’ लड़कियां चुपचाप सिर हिलाकर अंदर चली गईं। अंदर ड्राइंग रूम में मेहमान बैठे थे। वे सीधे सत्ता में नहीं थे, लेकिन सत्ता के करीब थे। एपस्टीन कमरे में घूमते हुए परिचय करवा रहा था। ‘ये हमारे दोस्त हैं!’ उसने कहा।
‘ये बाहर से आए हैं।’ ‘इन्हें अपनी कंपनी के लिए फंड चाहिए।’ उसकी दुनिया में कुछ भी खुलकर नहीं कहा जाता था। सब कुछ इशारों में होता था। गोपनीयता उसकी सबसे बड़ी गारंटी थी। साल १९९८ में वह एक निजी जेट में बैठा था। सामने की सीट पर एक युवा लड़की खिड़की से बाहर देख रही थी। एपस्टीन ने फाइल खोली। उसमें कई नाम थे, नंबर थे और थीं तारीखें। उसने किसी से कॉल पर सेटिंग की, ‘हां, सब तय है। अगले हफ्ते मिलना होगा, हां-हां पूरी प्राइवेसी रहेगी।’ फोन बंद हो गया। जेट तेजी से हवा में तैरता आगे बढ़ रहा था। एपस्टीन के लिए लड़कियां लोग नहीं थीं, वे साधन थीं। एक ऐसी टूल, जिससे वह ताकतवर लोगों तक अपनी पहुंच बनाए रखता था। लेकिन २००० के दशक की शुरुआत में पहली शिकायत दर्ज हुई थी। फिर दूसरी। बातें फुसफुसाहट से आगे बढ़ने लगी थीं।
(शेष अगले अंक में)

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