मुख्यपृष्ठस्तंभविशेष : भाजपा की ‘शिकार यात्रा'

विशेष : भाजपा की ‘शिकार यात्रा’

रमन मिश्र
इस ‘शिकार यात्रा’ यात्रा का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि भाजपा ने आप को केवल एक चुनावी प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि एक वैचारिक खतरे के रूप में देखा और उसे जड़ से हिलाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद का निरंतर प्रयोग किया।
इस ‘शिकार यात्रा’ को हम मुख्य रूप से तीन चरणों में देख सकते हैं:
१. प्रशासनिक और कानूनी घेराबंदी (२०१५-२०२१)
जब २०१५ में आप ने दिल्ली में ७० में से ६७ सीटें जीतीं, तब भाजपा ने प्रशासनिक स्तर पर नकेल कसनी शुरू की।
उपराज्यपाल बनाम मुख्यमंत्री: उपराज्यपाल के जरिए दिल्ली सरकार के पैâसलों को रोकना या उन्हें पलटना एक नियमित प्रक्रिया बन गई। मोहल्ला क्लिनिक से लेकर सीसीटीवी वैâमरों तक की फाइलें महीनों रुकी रहीं।
संसदीय सचिव विवाद: एक साथ २० विधायकों को ‘लाभ के पद’ के मामले में अयोग्य घोषित कराने की कोशिश की गई। हालांकि, बाद में उन्हें अदालत से राहत मिली।
छापेमारी की शुरुआत: मुख्यमंत्री कार्यालय (सीबीआई छापा) से लेकर सत्येंद्र जैन और अन्य मंत्रियों के खिलाफ मुकदमों का सिलसिला यहीं से शुरू हुआ।
२. ‘शीर्ष नेतृत्व’ पर सीधा प्रहार (२०२२-२०२४)
यह वह दौर था जब भाजपा ने आप के ‘मॉडल’ और ‘चेहरे’ को निशाना बनाया।
शराब नीति कांड: इस मामले को भाजपा ने सबसे बड़ा हथियार बनाया। इसके तहत मनीष सिसोदिया (शिक्षा मॉडल का चेहरा) और सत्येंद्र जैन (स्वास्थ्य मॉडल का चेहरा) को जेल भेजा गया।
केजरीवाल की गिरफ्तारी: मार्च २०२४ में खुद अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी इस यात्रा का चरम बिंदु थी। भाजपा का तर्क ‘भ्रष्टाचार’ था, जबकि आप ने इसे ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ बताया।
पार्टी की रीढ़ पर हमला: संजय सिंह जैसे प्रखर वक्ताओं को जेल भेजकर पार्टी की आवाज को संसद और सड़क पर कमजोर करने की कोशिश की गई।
३. ‘ऑपरेशन लोटस’ और वैचारिक सेंधमारी (वर्तमान – २०२६)
आज के संदर्भ में देखें तो यह शिकार अब ‘बाहरी’ के बजाय ‘आंतरिक’ हो गया है।
सांसदों का दलबदल: जैसा कि ताजा घटनाक्रमों (अप्रैल २०२६) से स्पष्ट है, भाजपा ने आप के दूसरे समूह (पेशेवर और राज्यसभा सांसद) में बड़ी सेंध लगाई है। राघव चड्ढा, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह जैसे ७ सांसदों का भाजपा की ओर रुख करना ‘ऑपरेशन लोटस’ का सबसे नया अध्याय है।
शिकार’ की रणनीति दोहरी रही है:
संसाधन और शक्तिहीन करना: एजेंसियों (ईडी, सीबीआई) के जरिए नेताओं को कानूनी चक्रव्यूह में उलझाना।
विश्वसनीयता खत्म करना: सोशल मीडिया और विज्ञापनों के जरिए ‘कट्टर ईमानदार’ की छवि को ‘कट्टर भ्रष्ट’ में बदलना।

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