अनिल तिवारी
मुंबई
सड़क पर जाम, डिपो खाली
सरकार राजस्व क्यों नहीं कमाती?
मुंबई महानगरीय क्षेत्र यानी एमएमआर केवल मुंबई शहर तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र ६,३२८ वर्ग किलोमीटर में पैâला हुआ है और इसमें ग्रेटर मुंबई, ठाणे, कल्याण-डोंबिवली, नवी मुंबई, उल्हासनगर, भिवंडी-निजामपुर, वसई-विरार, मीरा-भायंदर और पनवेल जैसी ९ महानगरपालिकाएं, कई नगर परिषदें और एक हजार से अधिक गांव शामिल हैं। यानी यह केवल एक शहर की परिवहन समस्या नहीं, बल्कि पूरे महानगरीय क्षेत्र की रोजमर्रा की आर्थिक, पर्यावरणीय और प्रशासनिक चुनौती है।
निजी बसें: सुविधा भी, समस्या भी
मुंबई और उसके आसपास से रोजाना हजारों निजी इंटरसिटी बसें देश में दूरदराज के कई शहरों की ओर जाती हैं। इन बसों की मांग इसलिए भी है क्योंकि ये यात्रियों को एंड टू एंड कनेक्टिविटी, बेहतर पिकअप, रात्रियात्रा विकल्प, स्लीपर सीट, ऑनलाइन बुकिंग और अपेक्षाकृत लचीली सुविधाएं देती हैं। समस्या यह नहीं कि निजी बसें चलती हैं। समस्या यह है कि इनके लिए एमएमआर में सुव्यवस्थित बस टर्मिनल, पिकअप-बे, पार्किंग, टिकटिंग और वेटिंग रूम्स का भारी अभाव है। परिणाम यह है कि ये बसें मुख्य सड़कों, सर्विस रोड, फ्लाईओवर के नीचे, हाईवे के किनारे, मॉल/पेट्रोल पंपों के आसपास और व्यस्त जंक्शनों पर खड़ी दिखाई देती हैं। कई जगह बसें गलत दिशा में या सड़क की क्षमता घटाते हुए खड़ी रहती हैं। इससे ट्रैफिक जाम, ईंधन की बर्बादी, प्रदूषण, दुर्घटना-जोखिम और यात्रियों की असुविधा सब एक साथ बढ़ते हैं। हाल में बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा नियुक्त पैनल ने भी एमएमआर में वायु प्रदूषण के कारणों में ट्रैफिक जाम, पार्किंग अव्यवस्था और वाहनों से उत्सर्जन को महत्वपूर्ण कारक माना है। यानी निजी बसों की सड़क-आधारित अव्यवस्था केवल ट्रैफिक पुलिस की समस्या नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और शहरी नियोजन का भी प्रश्न है।
एमएमआर और निजी/इंटरसिटी बसें
सरकार या परिवहन विभाग की ओर से एमएमआर की निजी इंटरसिटी बसों का कोई साफ-सुथरा सार्वजनिक दैनिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इसलिए उपलब्ध बुकिंग-प्लेटफॉर्मों पर दिखने वाले रूट-आधारित आंकड़ों के आधार पर एक व्यावहारिक अनुमान लगाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, मुंबई-पुणे रूट पर ८०० के करीब दैनिक बस सेवाएं दिखती हैं, जिनमें सरकारी और निजी दोनों शामिल हो सकती हैं। मुंबई-सूरत रूट पर लगभग ३७५ से ४०० प्रत्यक्ष बसें दिखाई देती हैं। मुंबई-अमदाबाद रूट पर लगभग ३०० से ३२५ बसें नजर आती हैं। इन प्रमुख रूटों के साथ नासिक, शिरडी, कोल्हापुर, कराड़, जलगांव, गोवा, वापी, नवसारी, भरूच, वलसाड, वडोदरा, अंकलेश्वर, हैदराबाद, मैगलोर, बेंगलुरु, बेलगाम, हुबली, इंदौर, धुले, छत्रपति संभाजीनगर, महाबलेश्वर, रत्नागिरी, नागपुर, सांगली, सातारा, सोलापुर, उदयपुर, जयपुर आदि रूट जोड़ें तो पूरे एमएमआर से प्रतिदिन लगभग ४,००० से ४,५०० निजी बस मूवमेंट का अनुमान अनुचित नहीं होगा। यहां ‘मूवमेंट’ से आशय है प्रस्थान, आगमन, पिकअप, ड्रॉप, खाली बस की आवाजाही और रात की पार्किंग/होल्डिंग। त्योहारों, सप्ताहांत, गर्मी की छुट्टियों और विवाह-सीजन में यह संख्या और बढ़ जाती है।
उक्त आंकड़े सरकार प्रमाणित आंकड़े नहीं हैं, फिर भी सार्वजनिक बुकिंग प्लेटफॉर्मों पर दिखनेवाले बस विकल्पों के आधार पर संकेतात्मक अनुमान तो लगाया ही जा सकता है। असल आंकड़े इससे काफी बड़े भी हो सकते हैं। फिर भी यह ये बताने के लिए काफी हैं कि समस्या छोटी नहीं है।
बसें कहां-कहां से चलती हैं?
एमएमआर में निजी बसों के पिकअप पॉइंट बिखरे हुए हैं। मुंबई में बोरीवली, कांदिवली, मलाड, गोरेगांव, जोगेश्वरी, अंधेरी, विले पार्ले, सांताक्रूज, बांद्रा, माहिम, दादर, सायन, कुर्ला, चेंबूर, घाटकोपर, विक्रोली, भांडुप, मुलुंड समेत कई प्रमुख पिकअप पॉइंट्स हैं। ठाणे क्षेत्र में मुलुंड-चेकनाका, ठाणे पश्चिम, माजीवाड़ा, घोडबंदर रोड, कलवा, मुम्ब्रा, भिवंडी और कल्याण-डोंबिवली बेल्ट से भी बड़ी संख्या में बसें यात्रियों को उठाती हैं। नवी मुंबई और पनवेल क्षेत्र में ऐरोली, वाशी, सानपाड़ा, नेरुल, बेलापुर, खारघर, कलंबोली और पनवेल काफी महत्वपूर्ण पिकअप-कॉरिडोर हैं। पुणे एक्सप्रेसवे, गोवा हाईवे समेत तमाम हाईवे पर इन निजी बसों के अड्डे हैं। वसई-विरार और मीरा-भायंदर बेल्ट से गुजरात, राजस्थान और उत्तर भारत की ओर जाने वाली बसों की बड़ी मांग है। दहिसर, मीरा रोड, भायंदर, वसई, नालासोपारा और विरार के पिकअप पॉइंट अक्सर मुख्य सड़कों और हाईवे ट्रैफिक को बाधित करते नजर आते हैं।
जब डिपो हैं, तो सड़कें
बस अड्डा क्यों बनें?
एमएमआर में बेस्ट, एनएमएमटी, टीएमटी, केडीएमटी, एमबीएमटी, वीवीएमटी और अन्य नगर परिवहन उपक्रमों के पास तमाम बस डिपो, टर्मिनस, बस-स्टैंड और ट्रांसपोर्ट लैंड उपलब्ध है। इनमें से कई स्थान पूरे दिन समान रूप से उपयोग में भी नहीं आते। कुछ डिपो रातभर खाली पड़े रहते हैं, कुछ में बसों की संख्या घटने से उनकी क्षमता का समुचित उपयोग नहीं होता और कुछ संपत्तियों को राजस्व बढ़ाने के लिए पुनर्विकास या व्यावसायिक उपयोग की दृष्टि से देखा जाता है।
बेस्ट की आर्थिक स्थिति पर लगातार चर्चा होती रही है। २०२५ में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री द्वारा बेस्ट के कुछ डिपो के पुनर्विकास को मंजूरी देने की खबर आई थी, जिसका उद्देश्य राजस्व बढ़ाना बताया गया था। एक अन्य रिपोर्ट में बेस्ट की वित्तीय स्थिति, फ्लीट और गैर-किराया आय बढ़ाने की जरूरत का उल्लेख किया गया था। बीएमसी द्वारा बेस्ट को हजारों करोड़ रुपए की सहायता दिए जाने की बात भी सामने आई थी। ऐसे में प्रश्न बहुत स्वाभाविक है कि जब सार्वजनिक परिवहन संस्थाओं के पास भूमि और डिपो हैं, तो निजी बसों को नियंत्रित शुल्क के साथ इन्हीं डिपो/टर्मिनलों से क्यों नहीं चलाया जाता?
प्रस्ताव: निजी बसों के लिए ‘एमएमआर इंटरसिटी बस टर्मिनल नेटवर्क’
सरकार को पूरे एमएमआर के लिए एक समेकित नीति बनानी चाहिए, जिसके तहत निजी बसों को सड़क किनारे खड़े होने के बजाय निर्धारित डिपो/टर्मिनस से ही पिकअप और ड्रॉप की अनुमति हो। यह व्यवस्था बेस्ट समेत तमाम परिवहन मंडलों के डिपो के माध्यम से लागू की जा सकती है। इस मॉडल में हर बस को मनमाने पिकअप की अनुमति देने के बजाय डिजिटल स्लॉट, निर्धारित प्लेटफॉर्म, पार्विंâग अवधि और शुल्क से बांधा जा सकता है। जिस तरह एविएशन सेक्टर में होता है।
सरकार को इससे क्या लाभ होगा?
१. राजस्व का नया स्रोत
अगर हर निजी बस से प्रति आगमन/प्रस्थान ३०० से १,००० रुपये तक उपयोग शुल्क लिया जाए, तो बड़े पैमाने पर राजस्व बन सकता है। उदाहरण के लिए, यदि एमएमआर में प्रतिदिन ३,००० बस मूवमेंट को औसतन ५०० रुपये शुल्क पर संगठित किया जाए, तो दैनिक आय १५ लाख रुपये और वार्षिक आय लगभग ५४-५५ करोड़ रुपये हो सकती है। आंकड़े बढ़े तो यह आय १०० करोड़ को भी पार कर सकती है। यदि प्रीमियम स्लॉट, रात की पार्किंग, यात्री सुविधा शुल्क और विज्ञापन आय जोड़ी जाए तो यह रकम ५०० करोड़ से भी अधिक हो सकती है।
विश्व बैंक के पीपीपी रिसोर्स सेंटर के अनुसार बस शेल्टर, स्टेशन और टर्मिनल को पीपीपी मॉडल से विकसित कर नगरपालिकाएं कंसेशन फीस, लीज फीस, विज्ञापन, वाणिज्यिक विकास, पार्किंग शुल्क और बस-चार्ज के माध्यम से राजस्व कमा सकती हैं।
२. सड़क जाम में कमी
बसों के सड़क किनारे खड़े होने से सड़क की प्रभावी चौड़ाई घटती है। यात्रियों के ऑटो, टैक्सी, निजी कार और सामान ढोने वाले वाहन भी वहीं जमा हो जाते हैं। यदि निजी बसें भी डिपो/टर्मिनल से संचालित होंगी, तो मुख्य सड़कों पर रुकावट भी कम होगी। इससे जाम घटेगा, औसत यात्रा समय सुधरेगा और ईंधन की बर्बादी कम होगी।
३. प्रदूषण में कमी
जाम में फंसी गाड़ियां लगातार ईंधन जलाती हैं। डीजल बसों और निजी वाहनों की कतार से उत्सर्जन बढ़ता है। जब हाईवे और मुख्य सड़कों पर अव्यवस्थित बस-पार्किंग कम होगी, तो वाहन प्रवाह सुधरेगा और प्रदूषण घटेगा। एमएमआर में ट्रैफिक जाम और पार्किंग अव्यवस्था को प्रदूषण से जोड़कर देखा जा चुका है।
४. यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा
आज कई यात्री रात में सड़क किनारे, पेट्रोल पंप, फ्लाईओवर के नीचे या अस्थायी पिकअप पॉइंट पर बस का इंतजार करते हैं। महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों, बच्चों और बाहर से आए यात्रियों के लिए यह असुरक्षित और असुविधाजनक है। निर्धारित टर्मिनल में प्रतीक्षालय, शौचालय, सीसीटीवी, पेयजल, टिकटिंग सहायता, पुलिस सहायता और डिजिटल डिस्प्ले जैसी सुविधाएं दी जा सकती हैं।
५. निजी बसों पर निगरानी
एक बार बसें निर्धारित टर्मिनलों से चलेंगी तो प्रशासन के लिए यह जांचना आसान होगा कि बस के पास परमिट है या नहीं, फिटनेस सर्टिफिकेट, बीमा, चालक का लाइसेंस, फायर सेफ्टी, जीपीएस, ओवरलोडिंग और किराया नियंत्रण का पालन हो रहा है या नहीं। महाराष्ट्र सरकार निजी बसों के किराये को एम एस आर टी सी किराये से जोड़कर नियंत्रित करने की नीति पहले भी लागू कर चुकी है, जिसमें निजी बसों को सामान्य एमएसआरडीसी किराये से अधिकतम ५० प्रतिशत ज्यादा किराया लेने की सीमा बताई गई थी।
कुल मिलाकर देखा जाए तो मुंबई महानगरीय क्षेत्र से रोजाना हजारों निजी बसें संचालित होती हैं। ये बसें यात्रियों के लिए उपयोगी हैं, लेकिन इनके संचालन के लिए कोई सुव्यवस्थित टर्मिनल व्यवस्था नहीं होने से इनसे सिस्टम में बाधा उत्पन्न होती है। ट्रैफिक जाम, ईंधन की बर्बादी, प्रदूषण, दुर्घटना-जोखिम और यात्रियों की असुविधा बढ़ती है। यदि इन बसों को संयुक्त बस अड्डों से संचालित करने का मॉडल लागू किया जाए तो इससे काफी सुविधा होगी। इसके लिए सरकार को अपने स्तर पर निजी बसों का सर्वे, डिजिटल स्लॉट व्यवस्था, चुने हुए टर्मिनल, सख्त प्रवर्तन और स्पष्ट शुल्क नीति लागू करनी चाहिए। निजी बसों के संचानल को व्यवस्थित करना जरूरी है। यदि सरकार सड़क किनारे खड़ी निजी बसों को सार्वजनिक डिपो/टर्मिनल व्यवस्था से जोड़े, तो यात्रियों को सुविधा, शहर को ट्रैफिक से राहत और सरकार को नया राजस्व तीनों लाभ मिल सकते हैं।
कुल मिलाकर देखा जाए तो मुंबई महानगरीय क्षेत्र से रोजाना हजारों निजी बसें संचालित होती हैं। ये बसें यात्रियों के लिए उपयोगी हैं, लेकिन इनके संचालन के लिए कोई सुव्यवस्थित टर्मिनल व्यवस्था नहीं होने से इनसे सिस्टम में बाधा उत्पन्न होती है। ट्रैफिक जाम, ईंधन की बर्बादी, प्रदूषण, दुर्घटना-जोखिम और यात्रियों की असुविधा बढ़ती है। यदि इन बसों को संयुक्त बस अड्डों से संचालित करने का मॉडल लागू किया जाए तो इससे काफी सुविधा होगी।
हाल में बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा नियुक्त पैनल ने भी एमएमआर में वायु प्रदूषण के कारणों में ट्रैफिक जाम, पार्किंग अव्यवस्था और वाहनों से उत्सर्जन को महत्वपूर्ण कारक माना है। यानी निजी बसों की सड़क-आधारित अव्यवस्था केवल ट्रैफिक पुलिस की समस्या नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और शहरी नियोजन का भी प्रश्न है।
विश्व बैंक के पीपीपी रिसोर्स सेंटर के अनुसार बस शेल्टर, स्टेशन और टर्मिनल को पीपीपी मॉडल से विकसित कर नगरपालिकाएं कंसेशन फीस, लीज फीस, विज्ञापन, वाणिज्यिक विकास, पार्किंग शुल्क और बस-चार्ज के माध्यम से राजस्व कमा सकती हैं।
(कल पढ़ें- अन्य राज्यों में रोडवेज और निजी बसों के संचालन की क्या व्यवस्था है? सरकारों की संभावित आपत्तियां क्या होंगी और इसे लागू करने का रोडमैप क्या होगा?)
