जेदवी / मुंबई
मुंबई में वर्षों से रेलवे की जमीन पर फलते-फूलते अतिक्रमण पर आखिरकार प्रशासन की नींद खुली, लेकिन तब, जब ‘विकास’ का बुलडोजर चलाने की बारी आई। वाडी बंदर इलाके में स्थित रेलवे यार्ड में अचानक सख्ती दिखाते हुए ४५ झोपड़ियों को जमींदोज करते हुए उसमें रहनेवाले ४५ परिवारों को बेघर कर दिया गया है। इस कार्रवाई को ‘वंदे भारत मेंटेनेंस डिपो’ के निर्माण से जोड़ा जा रहा है।
हैरानी की बात यह है कि जिन अवैध कब्जों पर बुलडोजर चला, वे कोई एक-दो दिन में खड़े नहीं हुए थे। सालों से वहां झोपड़ियां खड़ी थीं। तब प्रशासन और रेलवे की आंखों पर पट्टी क्यों बंधी रही? यह सवाल अब स्थानीय नागरिकों के बीच गूंज रहा है। हैंकॉक ब्रिज के पास, बीडी चॉल के नजदीक स्थित इस इलाके में कार्रवाई के दौरान भारी पुलिस और रेलवे सुरक्षा बल की तैनाती की गई थी, ताकि किसी भी विरोध को दबाया जा सके। प्रशासन का दावा है कि पूरी कार्रवाई कोर्ट के आदेश और कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई, लेकिन प्रभावित परिवारों के लिए यह ‘कानूनी प्रक्रिया’ किसी सजा से कम नहीं।
पुनर्वास की व्यवस्था नहीं
स्थानीय लोगों का कहना है कि नोटिस जरूर दिया गया, लेकिन पुनर्वास की कोई ठोस व्यवस्था नहीं की गई। वर्षों से बसे लोगों को अचानक बेघर कर देना क्या न्यायसंगत है? रेलवे का तर्क है कि वंदे भारत जैसी महत्वपूर्ण परियोजना के लिए जमीन खाली कराना जरूरी है, जिससे ट्रेनों की बेहतर देखरेख हो सके, लेकिन सवाल वहीं खड़ा है कि क्या हर बार प्रशासन की लापरवाही का खामियाजा गरीबों को ही भुगतना पड़ेगा?
