अमरावती विभाग में लंबे समय तक विधायक और मंत्री रहे श्रीमान बच्चू कडू ने स्वयं को मिंधे गुट में विलीन कर जीवित समाधि ले ली है। इस समाधि समारोह में स्वयं उप मुख्यमंत्री मिंधे और कडू के अनुयायी उपस्थित थे। कडू का यह समाधि और समर्पण का समारोह संपन्न होने के बाद, उनकी राजनीतिक ‘वैकुंठ यात्रा’ सुचारु रूप से चलती रहे, इसके लिए उनके नए गुरु महाराज शिंदे ने उन्हें विधान परिषद की उम्मीदवारी दी है। इसी कारण समाधि की अवस्था में कडू को ईश्वर के दर्शन हो गए। जब से कडू विधानसभा चुनाव हारे हैं, तब से वे जल विहीन मछली की तरह तड़पते हुए दिखाई दे रहे थे। एक सामाजिक कार्यकर्ता की यह तड़प समाज को विचलित करने वाली है। कडू ने किसानों की समस्याओं के लिए मोर्चे निकाले और आंदोलन किए। उन्होंने दिव्यांगों और वंचितों के प्रश्नों पर निरंतर स्वर मुखर किया। उनके प्रहार संगठन के कार्यकर्ता पूरे महाराष्ट्र में सक्रिय थे। वे उद्धव ठाकरे के मंत्रिमंडल में मंत्री थे, लेकिन जब मिंधे गुट अलग हुआ और सरकार गिरी, तब ये ‘सेवाभावी’ कार्यकर्ता सूरत, गुवाहाटी और गोवा जैसी ‘तीर्थयात्रा’ कर महाराष्ट्र लौटे। वे इस तरह सरकार के दरबार में घूमने लगे मानो गंगा स्नान कर परम आनंद की प्राप्ति हुई हो। इससे जनता के सम्मुख उनका वास्तविक रूप प्रकट हो गया। कडू समाजसेवा का मुखौटा पहनकर राजनीति करनेवाले और स्वार्थ सिद्ध करनेवाले व्यक्तित्व हैं। वर्तमान में महाराष्ट्र की राजनीति में ऐसे लोगों की बाढ़ सी आ गई है और कडू उनके मार्गदर्शक एवं आदर्श बनकर उभरे हैं। वे स्वयं को मूल शिवसैनिक बताते हैं, किंतु जब शिवसेना की उम्मीदवारी नहीं मिली, तब उन्होंने बड़ी सेवाभावी वृत्ति से
शिवसेना और हिंदुत्व
का त्याग कर दिया। वे विधर्मी बन गए। जनता ने उन्हें निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुन लिया। इसके पश्चात वे फडणवीस और मोदी की नीतियों की आलोचना करते रहे और महाविकास आघाड़ी में मंत्री पद प्राप्त कर लिया। कोविड काल के बाद जैसे ही सत्ता परिवर्तन का संकेत मिला, उन्होंने दिव्यांगों और खेतिहर मजदूरों के कल्याण के नाम पर मिंधे की प्रशंसा शुरू कर दी। इतनी चापलूसी के बाद भी जब मंत्री पद नहीं मिला, तब उन्होंने पुन: सरकार की आलोचना, अनशन और आंदोलन प्रारंभ कर दिए। कडू महाराज २०२४ के विधानसभा चुनाव में पराजित हो गए। जब जनता ने उनके विधायक होने का अहंकार उतारा, तब से उनकी छटपटाहट बढ़ गई थी। अब इस तड़पती आत्मा ने नवीन वस्त्र धारण कर मिंधे पक्ष में प्रवेश किया है और पुन: बतौर ‘विधायक’ प्राणज्योति का दीया प्रज्वलित किया। विधायक पद के लिए कडू महाराज द्वारा ली गई यह समाधि वास्तव में समाजसेवा के नाम पर किए जा रहे पाखंड का पर्दाफाश है। अब कडू महाराज मिंधे की शक्ति बढ़ाने के लिए पूर्ण निष्ठा से कार्य करेंगे। हालांकि, मात्र दो दिन पूर्व उनका कथन था, ‘हम विधायक पद के लिए मिंधे के साथ नहीं जाएंगे। विधायक पद के लोभ में उनके साथ चले जाएं हम इतने नालायक नहीं हैं।’ कडू महाराज आज अपनी ही बात विस्मृत कर ‘मिंधेवासी’ हो गए हैं। अमरावती में बच्चू कडू बनाम रवि राणा का संघर्ष जगजाहिर है। इन दो ‘नौटंकियों’ के बीच का यह संघर्ष मात्र जनता को मूर्ख बनाने का धंधा है। जब भाजपा ने राणा को उम्मीदवारी दी, तब कडू ने इसे लाचारी कहा था। अब कडू महाराज ने जो समाधि ली है, उसे
लाचारी के किस स्तर
पर रखा जाए? किसानों के मुद्दों पर बच्चू कडू ने मंत्री गुलाबराव पाटील के आवास पर मोर्चा ले जाने की घोषणा की थी। इस पर गुलाबराव पाटील ने उन्हें चुनौती दी थी ‘यदि साहस है तो मोर्चा निकालकर दिखाओ।’ परिणामत: वह मोर्चा कभी निकला ही नहीं और अब स्वयं कडू महाराज मिंधे की गुलाब सेना में विलीन हो गए। यह महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीति का अत्यंत विचित्र स्वरूप है। कडू का तर्क है कि विधायक पद के बिना कार्य करना या कार्यकर्ताओं की मांगें पूरी करना संभव नहीं है। वे स्पष्टीकरण दे रहे हैं कि किसानों, दिव्यांगों और विधवाओं की मांगें मान ली गई हैं इसलिए उन्होंने मिंधे से हाथ मिलाया है। किंतु इस समाधि प्रकरण में वे पूरी तरह से बेआबरू हो चुके हैं। भाजपा आगामी चुनाव अपने बल पर लड़ने की तैयारी में है। भाजपा की गाड़ी अब पूर्ण रूप से भर चुकी है, जिसमें किसी अन्य के लिए स्थान शेष नहीं है। यह गाड़ी अब अजीत पवार और मिंधे के गुटों को ठोकर मारकर आगे बढ़ने की योजना बना रही है। अजीत पवार की पार्टी को निगलने की तैयारी पूर्ण है और निकट भविष्य में मिंधे के विधायक भी भाजपा की शरण में जा सकते हैं। जब मिंधे अकेले रह जाएंगे, तब कडू महाराज जैसे लोग अपनी समाधि त्याग कर भाजपा का गुणगान करेंगे और दिव्यांगों के न्याय के नाम पर भाजपा की गाड़ी में लटकने का प्रयास करेंगे। कडू महाराज की यह समाधि मात्र एक पाखंड है और गिरते हुए राजनीतिक स्तर की तस्वीर भी है। विधान परिषद की सीढ़ी के जरिए कडू महाराज राजनीतिक वैकुंठ की ओर अग्रसर हैं, जबकि दिव्यांग, किसान और विधवाएं आज भी वहीं हैं, जहां वे पहले थे।
