राजन पारकर
६ मई… यह दिन केवल एक राजा के पुण्यस्मरण का दिन नहीं है; यह दिन उस युगपुरुष को कृतज्ञतापूर्वक नमन करने का दिन है, जिन्होंने सिंहासन को वैभव का प्रतीक नहीं, बल्कि समाजकल्याण का माध्यम बनाया।
राजर्षि शाहू महाराज का नाम लेते ही आंखों के सामने केवल एक शासक नहीं, बल्कि प्रजा के दुखों को अपने हृदय से लगाने वाला एक करुणामय समाजक्रांतिकारी व्यक्तित्व उभरता है। जिन्होंने अपने राजसिंहासन को मुकुट की शोभा नहीं, बल्कि बहुजन समाज के आंसू पोंछने का संकल्प माना।
राजर्षि शाहू महाराज ने भारतीय समाज की सबसे गहरी पीड़ा को पहचाना-जातिगत अन्याय, सामाजिक विषमता और शिक्षा से वंचित बहुजन समाज। उन्होंने इन अन्यायपूर्ण दीवारों पर केवल शब्दों से प्रहार नहीं किया, बल्कि शासन की शक्ति से उन्हें हिला कर रख दिया।
“शिक्षा ही मुक्ति का सबसे बड़ा शस्त्र है”-इस विचार को उन्होंने केवल कहा नहीं, बल्कि अपने शासन में साकार किया। बहुजन, दलित, किसान, श्रमिक और महिलाओं के लिए विद्यालय, छात्रावास, छात्रवृत्ति और निःशुल्क शिक्षा के द्वार खोल दिए। जिन्हें समाज ने अंधकार में रखा, उनके जीवन में शाहू महाराज ने ज्ञान का दीप प्रज्वलित किया।
१९०२ में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण लागू करने का उनका निर्णय भारतीय सामाजिक न्याय के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं था; यह सामाजिक समता की दिशा में क्रांतिकारी कदम था। आज भारतीय संविधान में सामाजिक न्याय के जो मूल्य दिखाई देते हैं, उनकी प्रारंभिक नींव राजर्षि शाहू महाराज ने ही रखी थी।
उन्होंने अस्पृश्यता, जातिभेद और सामाजिक अन्याय को खुली चुनौती दी। मंदिर प्रवेश, सार्वजनिक सुविधाएँ, शिक्षा और प्रशासन-हर क्षेत्र में समान अवसर प्रदान कर उन्होंने यह सिद्ध किया कि मनुष्य की महानता उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसकी मानवता से निर्धारित होती है।
महात्मा ज्योतिराव फुले के सत्यशोधक विचारों को उन्होंने संरक्षण दिया, वहीं डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जैसे महामानव के सामाजिक संघर्ष को प्रेरणादायी आधार प्रदान किया। शाहू महाराज सामाजिक परिवर्तन की उस महान परंपरा के स्तंभ थे, जिन्होंने भारत को समतामूलक समाज की दिशा में आगे बढ़ाया।
उनका शासन सामाजिक न्याय की प्रयोगशाला था।
उनकी नीतियां बहुजन सम्मान की राज्यघोषणा थीं।
उनका जीवन करुणा, प्रगति और समता की अमर गाथा था।
आज यदि सामाजिक न्याय विभाग, शासन व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाएं वास्तविक प्रेरणा प्राप्त करना चाहें, तो उन्हें राजर्षि शाहू महाराज के कार्यों से ही दिशा मिलेगी। क्योंकि उन्होंने सिद्ध किया कि सामाजिक न्याय दया का विषय नहीं, बल्कि शासन का सर्वोच्च कर्तव्य है।
राजर्षि शाहू महाराज की पुण्यतिथि केवल श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुँचाने के संकल्प का दिवस है। उनके विचार आज भी प्रत्येक प्रशासक, समाजसेवी, शिक्षक और परिवर्तनवादी कार्यकर्ता के लिए प्रकाशस्तंभ हैं।
आज उनके चरणों में नमन करते हुए हमें यह संकल्प लेना चाहिए- जाति, धर्म, पंथ और भाषा से ऊपर उठकर सामाजिक समता की लड़ाई को और अधिक सशक्त बनाने का।
क्योंकि राजर्षि शाहू महाराज इतिहास का केवल एक अध्याय नहीं हैं; वे सामाजिक न्यायपूर्ण भारत का जीवंत संविधान हैं।
उनकी विरासत को संरक्षित रखना, वंचितों के उत्थान के लिए कार्य करना और समतामूलक भारत के निर्माण हेतु समर्पित रहना-यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है, यही वास्तविक पुण्यांजलि है।
राजर्षि शाहू महाराज को कोटि-कोटि नमन!
