अनिल तिवारी
तमिलनाडु और पुडुचेरी के चुनावी नतीजों ने भारतीय लोकतंत्र के सामने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है। क्या राजनीति अब विचार, सेवा और जनप्रतिनिधित्व का क्षेत्र रही भी है या फिर केवल धनबल, प्रभाव और अवसरवाद का खुला बाजार बन गई है? जहां अनैतिक रूप से अर्जित धन से कुछ भी खरीदा जा सकता है और किसी से भी खरीदा जा सकता है। यहां न तो विक्रेता का कोई ईमान है, न ही विक्रेता की कोई जवाबदेही। तमिलनाडु में ‘लॉटरी किंग’ कहे जाने वाले सैंटियागो मार्टिन के परिवार के तीन सदस्यों का अलग-अलग दलों से जीतकर विधानसभा पहुंचना इसी बदलती राजनीति का सबसे चुभता हुआ उदाहरण है। पत्नी लीमा रोज मार्टिन ने लालगुड़ी से एआईएडीएमके उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की, दामाद आधव अर्जुना ने टीवीके के साथ जीत हासिल की और बेटे जोस चार्ल्स मार्टिन ने पुडुचेरी की कामराज नगर सीट से विजय पाई। यह सिर्फ एक परिवार की चुनावी सफलता नहीं है; यह उस राजनीतिक कुसंस्कृति की जीत है, जिसमें हर दल को ऐसे प्रभावशाली और धनवान चेहरे चाहिए, जिनके पास वोट खरीदने की क्षमता हो, संसाधन हों और सत्ता के समीकरण साधने की ताकत हो। विचारधारा यहां पीछे छूट जाती है। परिवार का एक सदस्य एक दल से, दूसरा दूसरे दल से और तीसरा तीसरे राजनीतिक खेमे से जीतता है। यह बताता है कि राजनीति अब सिद्धांतों की नहीं, सौदागरी की राजनीति चल रही है।
सैंटियागो मार्टिन का नाम पहले भी राजनीतिक चंदे और जांच एजेंसियों के संदर्भ में चर्चा में रहा है। उनकी कंपनी २०१९ से २०२४ के बीच चुनावी बॉन्ड के जरिए बड़े राजनीतिक दानदाताओं में रही है। मार्टिन और उनकी कंपनी पर आरोप और जांचें चलती रही हैं, हालांकि आश्चर्यजनक ढंग से कभी दोषसिद्धि नहीं हुई। यही वह बिंदु है जहां लोकतंत्र की नैतिकता कटघरे में खड़ी हो जाती है। कानून कहता है कि दोष सिद्ध होने तक व्यक्ति निर्दोष है, लेकिन राजनीति की नैतिक कसौटी केवल अदालत की सजा से तय नहीं होनी चाहिए। जनता का प्रतिनिधि बनने के लिए चरित्र, पारदर्शिता और सार्वजनिक भरोसा भी जरूरी है।
तमिलनाडु का एक और नतीजा लोकतंत्र की रोमांचक, लेकिन चिंताजनक तस्वीर दिखाता है। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों में तिरुप्पत्तूर सीट पर टीवीके उम्मीदवार श्रीनिवासा सेतुपति ने डीएमके के के.आर. पेरियाकरुप्पन को केवल १ वोट से हराया बताया गया है। एक वोट की जीत लोकतंत्र की शक्ति भी है और चेतावनी भी। यह बताती है कि जनता का हर मत निर्णायक है, लेकिन यह भी याद दिलाती है कि जब चुनाव धनबल, जातीय समीकरण, प्रचार-तंत्र और छवि-प्रबंधन के हवाले हो जाएं, तो लोकतंत्र का परिणाम कितना नाजुक हो सकता है। आज स्थिति यह है कि समाज के शिक्षक, डॉक्टर, लेखक, पत्रकार, ईमानदार कार्यकर्ता और लोकहित में जीवन लगाने वाले लोग किनारे खड़े तमाशा देखने को मजबूर हैं। दूसरी ओर धनकुबेर, दागदार छवि वाले नेता, शराब और रेत माफिया, अपराधी पृष्ठभूमि के लोग और सत्ता से लाभ कमाने वाले समूह राजनीति के केंद्र में आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार से लेकर महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु तक राजनीति में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, जहां बाहुबल और धनबल ने वैचारिक राजनीति को पीछे धकेला है। समस्या किसी एक दल की नहीं है। लगभग हर पार्टी ऐसे चेहरों के लिए पलक-पांवड़े बिछाए बैठी है, जो चुनाव जिता सकें। टिकट अब जनसेवा का पुरस्कार नहीं, बल्कि चुनावी निवेश बनता जा रहा है। यही लोकतंत्र का वास्तविक पतन है। तमिलनाडु ने केवल एक घटना नहीं दिखाई; उसने पूरे देश को आईना दिखाया है। सवाल अब यह है कि जनता इस आईने में चेहरा देखकर शर्मिंदा होगी या फिर अगले चुनाव में फिर उसी बाजार से उसी को काटने वाले ‘कसाइयों’ को अपना प्रतिनिधि चुनती रहेगी।
