पांच में से तीन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी ने विजय प्राप्त की। इसमें पश्चिम बंगाल एक महत्वपूर्ण राज्य है। जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष श्यामाप्रसाद मुखर्जी इसी राज्य के थे। इसलिए मोदी-शाह जैसे संघवादियों को यहां अपनी केशरी पताका फहराने की तीव्र इच्छा थी। पंद्रह वर्षों के परिश्रम के बाद यह साध्य हुआ। श्यामाप्रसाद पश्चिम बंगाल में मुस्लिम लीग के मंत्रिमंडल में शामिल थे और जब अंग्रेजों के खिलाफ ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन शुरू हुआ, तब उन्होंने अंग्रेजों को पत्र लिखकर सूचित किया था कि भारतीय स्वतंत्रता के इस आंदोलन को पूरी तरह कुचल दिया जाए। भाजपा के ‘प्रतिमा पुरुष’ श्यामाप्रसाद ने ऐसी राष्ट्रविरोधी भूमिका क्यों ली, इसका विश्लेषण भाजपा के इतिहास विशेषज्ञों ने कभी नहीं किया। मुखर्जी भाजपा के मूल ‘तत्व पुरुष’ हैं। इसीलिए उनके कोलकाता पर ध्वज फहराकर भाजपा ने जीत के पटाखे फोड़े। खैर, जो भी हो, तीन राज्यों में जीत के लिए भाजपा का अभिनंदन करना चाहिए। उन्हें यह जीत सहज ही नहीं मिली है। इसके लिए उन्हें क्या-क्या ‘प्रपंच’ करने पड़े? मोदी और शाह को सबसे पहले चुनाव आयोग के मुख्य आयुक्त ज्ञानेश कुमार को नीति, सत्य और धर्म के पाठ पढ़ाने पड़े। चुनाव आयोग के पूरी तरह भाजपामय होने के बाद, उनके माध्यम से पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से ८०-८५ लाख वोट हटाने का एक
बड़ा ऑपरेशन
किया गया; और इस ऑपरेशन पर सुप्रीम कोर्ट मरहम-पट्टी न कर सके इसलिए पूरी न्यायपालिका को अपनी ‘सिस्टम’ में खींच लिया। पश्चिम बंगाल में धर्म खतरे में है और यदि ममता बनर्जी फिर से सत्ता में आर्इं तो यहां बांग्लादेशियों का राज्य स्थापित हो जाएगा, इस प्रकार का विष बोने के लिए विशेष टीमें तैनात की गर्इं।
मोदी-शाह ने यदि कोई बात ठान ली तो वे पीछे नहीं हटते। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के पदों पर आसीन इन दोनों ने देश के सभी सवालों को दो महीनों के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया और धर्म के उद्धार के लिए वे बंगाल में ही डेरा डालकर डटे रहे। इस दौरान मोदी ने एक बार भी विदेश यात्रा नहीं की। अंतर्राष्ट्रीय फोन नहीं उठाए। वे जनता और देश के मुद्दों पर नहीं बोले। अन्न-जल की परवाह किए बिना वे ‘झाल-मुरी’ खाकर दिन काटते रहे। क्या त्याग है? क्या संघर्ष है? क्या चिंतन है? सबकुछ विचित्र है। चुनाव आयोग ने ऐसा ‘अनुसंधान’ किया कि ममता बनर्जी को मतदान कर सकनेवाले ८०-८५ लाख मतदाताओं को सूची से ही बाहर कर दिया और इस प्रकार आयोग लोकतंत्र एवं राष्ट्रसेवा के महान कार्य की पालकी का कहार बन गया। अब मोदी ने घोषणा की है कि वे पश्चिम बंगाल को देश का नंबर एक राज्य बनाएंगे। मोदी चुनाव प्रचार के लिए जिस राज्य में जाते हैं, वहां यही राग अलापते हैं। तेलंगाना, बिहार, कर्नाटक, ओडिशा, हरियाणा ये सभी राज्य
नंबर एक
बनाएंगे, ऐसा उन्होंने समय-समय पर कहा है। अब उस सूची में पश्चिम बंगाल को भी डाल दिया गया। मोदी ने पश्चिम बंगाल के विकास की बातें तो कीं, लेकिन प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी पूरे देश को नंबर एक पर क्यों नहीं ले जा पाए? ऐसा पूछने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है। ऐसा प्रश्न पूछते ही उसे देशद्रोही करार दे दिया जाता है। पुलिस, सेना, ईडी, सीबीआई जैसी संस्थाओं को अपने ‘सिस्टम’ में ढालकर उन्हें इस तरह का प्रशिक्षण देना कोई मामूली काम नहीं है। इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री शाह को जो मशक्कत करनी पड़ी, उसे देखते हुए पश्चिम बंगाल और असम की जीत बहुत छोटी लगती है। इसी सिस्टम के बल पर वे अमेरिका, फ्रांस, यूरोप और पाकिस्तान के चुनाव जीतकर अपने आधिपत्य वाला एक विशाल हिंदू राष्ट्र का संकल्प पूरा कर सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत के बाद कहा कि साधना सिद्धि में बदल गई। हालांकि, पश्चिम बंगाल जैसे समाज सुधारकों, क्रांतिकारियों और कला-संस्कृति के पुरोधाओं के प्रदेश में, ‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम’ जैसे राष्ट्रगीतों की जन्मभूमि की तुलसी में ‘भांग’ उगते देखना लोकतंत्र और राष्ट्र के लिए पीड़ादायक है। यदि वे सीधे मार्ग से चुनाव जीते होते तो स्वागत योग्य होता, लेकिन लाखों लोगों को मतदान से वंचित रखकर हासिल की गई यह जीत देश को स्वीकार्य नहीं है!
