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बाजार में घबराहट…ज्वेलरी शेयरों में तेज गिरावट

सामना संवाददाता / मुंबई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से एक वर्ष तक सोना न खरीदने या खरीद कम करने की अपील के बाद भारतीय ज्वेलरी शेयरों में तेज गिरावट देखी गई। बाजार को डर है कि सरकार विदेशी मुद्रा भंडार बचाने और सोने के आयात को घटाने के लिए सोने पर आयात शुल्क बढ़ा सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, टाइटन, सेनको गोल्ड और कल्याण ज्वेलर्स जैसे शेयरों में लगभग ६ से ९ प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई। हालांकि, सरकारी सूत्रों ने कहा है कि फिलहाल सोना या चांदी पर आयात शुल्क बढ़ाने की कोई योजना नहीं है।
इस घबराहट की असली वजह केवल सोना नहीं, बल्कि तेल संकट है। पश्चिम एशिया में तनाव और ईरान से जुड़ी युद्ध-स्थिति के कारण कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया है। भारत कच्चे तेल और सोने, दोनों का बड़ा आयातक है इसलिए तेल महंगा होने और सोने का आयात बढ़ने से डॉलर की मांग बढ़ती है, रुपया कमजोर होता है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव आता है। ११ मई २०२६ को रुपया डॉलर के मुकाबले ९५.३१ के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ।

भारत के लिए चिंता
तेल और सोना दोनों भारत की आयात-निर्भरता को बढ़ाते हैं। तेल महंगा होता है तो पेट्रोल-डीजल, माल ढुलाई, बिजली, खाद, रसोई और महंगाई तक असर पहुंचता है। सोना अधिक आयात होता है तो विदेशी मुद्रा बाहर जाती है। यही कारण है कि सरकार अब र्इंधन बचत, गैर-जरूरी यात्रा में कमी, वर्क-प्रâॉम-होम, डिजिटल मीटिंग्स और सोने की खरीद घटाने जैसी अपील कर रही है। भारत में सोना केवल निवेश नहीं, सामाजिक-सांस्कृतिक वस्तु भी है। शादी-ब्याह, त्योहार और पारिवारिक बचत में सोने की बड़ी भूमिका है। इसलिए अगर सरकार सचमुच शुल्क बढ़ाती है या जनता खरीद घटाती है तो ज्वेलरी कारोबार, कारीगरों और खुदरा दुकानों पर असर पड़ सकता है।
बार-बार ऐसी मजबूरी का सामना क्यों?
बाजार को २०१२-१३ जैसे दौर की याद है, जब सोने के आयात को रोकने के लिए शुल्क बढ़ाए गए थे। जनता से सोना न खरीदने और र्इंधन बचाने की अपील संकट-काल में उचित लग सकती है, लेकिन सवाल यह है कि भारत जैसे विशाल देश को बार-बार ऐसी मजबूरी का सामना क्यों करना पड़ता है? यदि सरकार ने वर्षों पहले से सार्वजनिक परिवहन, इलेक्ट्रिक वाहन, सौर ऊर्जा, घरेलू उत्पादन, रेल-माल ढुलाई और वैकल्पिक र्इंधन पर ठोस नीति लागू की होती तो आज जनता से ‘त्याग’ की अपील न करनी पड़ती। सोने पर संयम केवल भावनात्मक अपील से संभव नहीं होगा। इसके लिए विश्वसनीय आर्थिक नीति, रुपए की मजबूती, रोजगार-सुरक्षा और वैकल्पिक निवेश साधनों पर भरोसा भी जरूरी है। वरना जनता सोना इसलिए खरीदती रहेगी, क्योंकि उसे कागजी वादों से ज्यादा भरोसा पीली धातु पर है।

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