मुख्यपृष्ठस्तंभकैंपस में कानून का डर क्यों खत्म हो रहा है?

कैंपस में कानून का डर क्यों खत्म हो रहा है?

अनिल तिवारी

लखनऊ और वाराणसी के शैक्षणिक परिसरों से आई घटनाएं अब केवल ‘छात्र और प्रशासन की आपसी लड़ाई’ कहकर टालने लायक नहीं रहीं। ये घटनाएं बताती हैं कि कई विश्वविद्यालयों में अनुशासन, सुरक्षा और त्वरित पुलिस-प्रतिक्रिया, तीनों मोर्चों पर गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं।
लखनऊ के पूर्वी जोन स्थित बीबीडी विश्वविद्यालय हॉस्टल को लेकर छात्रों का आरोप है कि एक वार्डन ने छात्रा की बेरहमी से पिटाई की, जिससे उसका हाथ टूट गया। इसके बाद गुस्साए छात्रों ने वार्डन की पिटाई कर दी, कैंपस में तोड़-फोड़ और भारी हंगामा हुआ। छात्रों का दावा है कि स्थानीय पुलिस तो दूर, डायल ११२ की टीम भी देर से पहुंची। यह तथ्य जांच का विषय है, लेकिन अगर आरोप सही हैं तो सवाल केवल विश्वविद्यालय प्रशासन पर नहीं, बल्कि पुलिस की त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली पर भी उठता है।
इसी लखनऊ में एमिटी यूनिवर्सिटी का मामला भी सामने आया, जहां एक लॉ स्टूडेंट को कार में बैठाकर उसके सहपाठियों ने लगातार थप्पड़ मारे। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वीडियो वायरल होने के बाद पांच छात्रों को निलंबित किया गया। पीड़ित को डेढ़ मिनट में ५०-६० थप्पड़ों और कैंपस में एसयूवी के भीतर बंधक बनाकर पिटाई का उल्लेख है। वाराणसी में भी स्थिति कम चिंताजनक नहीं दिखती। बीएचयू के बिरला हॉस्टल क्षेत्र में छात्रों के दो गुटों के बीच तनाव, फायरिंग के आरोप और मौके से गोली के खोखे मिलने जैसी घटनाएं सामने आर्इं। पुलिस ने फायरिंग की घटना को पुराने विवाद और कैंपस में वर्चस्व की लड़ाई से जुड़ा माना। बीएचयू परिसर में बिरला ‘ए’ हॉस्टल के बाहर फायरिंग और चार खोखे बरामद होने की रिपोर्ट दी। बीएचयू और आईआईटी-बीएचयू छात्रों के बीच बैरियर को लेकर हुआ टकराव भी इसी बिगड़ते माहौल का संकेत है। देर रात विवाद बढ़ा, वाहनों को नुकसान पहुंचा और पुलिस व प्रॉक्टोरियल बोर्ड को हस्तक्षेप करना पड़ा।
सबसे भयावह मामला वाराणसी के उदय प्रताप कॉलेज का है, जहां छात्र सूर्या प्रताप सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई। पुलिस ने मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी की और छात्र की मौत के बाद कैंपस में विरोध तेज हुआ।
इन घटनाओं में एक साझा पैटर्न दिखता है, पहले वैंâपस के भीतर विवाद बढ़ता है, फिर वीडियो वायरल होता है, फिर प्रशासन हरकत में आता है। यानी कार्रवाई अक्सर घटना रोकने के लिए नहीं, बल्कि बदनामी रोकने के लिए होती दिखती है।
विश्वविद्यालय केवल डिग्री बांटने की जगह नहीं हैं; वे युवाओं के भविष्य और परिवारों के भरोसे की जगह हैं। अगर हॉस्टल, पार्किंग और कैंपस गलियारे ही भय, दबंगई, मारपीट और फायरिंग के अड्डे बनने लगें, तो यह शिक्षा व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। जरूरत है, हर बड़े वैंâपस में २४ घंटे सक्रिय सुरक्षा नियंत्रण कक्ष, सीसीटीवी की वास्तविक निगरानी, छात्र शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई, पुलिस-विश्वविद्यालय संयुक्त सुरक्षा प्रोटोकॉल और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की।
कैंपस में जब कानून का डर लौटेगा, तभी पढ़ाई का माहौल लौटेगा। अभी तस्वीर यही कह रही है कि उत्तर प्रदेश के कई प्रतिष्ठित शैक्षणिक परिसरों में अनुशासन की जगह अराजकता और संवाद की जगह दबंगई लेती जा रही है।

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