संजय राऊत
देश में द्वेष, धर्मांधता की आंधी चल रही है, ऐसे में स्वर्ग की ख्याति प्राप्त जम्मू-कश्मीर जाने का मौका मिला। भारत को हमारे शासकों ने नरक बना दिया। पर कश्मीर का नंदनवन (स्वर्ग) इससे ज्यादा बर्बाद न हो, ऐसा विचार वहां पहुंचने पर मन में आया। जिस ताज होटल में मैं रुका था, वहां की खिड़की से पहाड़ पर मौजूद शंकराचार्य का मंदिर दिखता है। हरी-भरी झाड़ियों के बीच वह बसा है। डल झील के किनारे यह पहाड़ है। आदिशंकराचार्य ने आठवीं सदी में यहां कठोर साधना की थी। मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब तीन सौ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। इतिहास, अध्यात्म और प्राकृतिक सौंदर्य का यह अनोखा संगम और चमत्कार है। श्रीनगर की गोपाद्री पर्वत शिखर पर आदिशंकराचार्य का यह स्थान है। वहां एक प्राचीन शिवमंदिर है। कश्मीर पर कई संकट और हमले हुए। पर चोटी पर यह मंदिर हमेशा सुरक्षित रहा। हिंदू धर्म के प्रचार के लिए आदिशंकराचार्य ने यहीं से भारत भ्रमण की शुरुआत की थी। वह मंदिर देश के हिंदू समाज को आज भी प्रेरणा देता है। आश्चर्य यह है कि सोमनाथ से लेकर अयोध्या तक, काशी से मथुरा तक कई मंदिरों पर मुगल सम्राटों के हमले हुए। मंदिर ध्वस्त हुए, पर बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी से घिरे गोपाद्री पर्वत पर स्थित यह मंदिर सुरक्षित रहा, वह सिर्फ हिंदुओं की वजह से नहीं। शंकराचार्य का यह स्थान कश्मीर घाटी की सांस्कृतिक विरासत है, ऐसा मुसलमानों ने माना और इस इतिहास को सहेजना चाहिए, यह उन्होंने तय किया। कुछ भी हो, १९९५ के बाद कश्मीर से हजारों पंडितों को पलायन करना पड़ा, कई लोगों की हत्या हुई। उस पूरे दौर में हिंदुओं का यह शक्तिपीठ स्थितप्रज्ञ बना रहा। रात के अंधेरे में पहाड़ पर शंकराचार्य मंदिर जगमगाता दिखता है। वह दृश्य मनमोहक है।
पर्यटकों का आगमन शुरू
पुलवामा, पहलगाम हमले का साया आज भी कश्मीर पर है। पर्यटक फिर से आने लगे हैं, पर यह संख्या सौ फीसदी नहीं है। पर्यटकों की संख्या २५ प्रतिशत तक घट गई है। इसका असर कश्मीर की आर्थिक गतिविधियों पर हुआ है। जिसे हम स्वर्ग कहते हैं, वहां की बहुसंख्य जनता गरीब है और सरकार की मेहरबानी पर जी रही है। फिर हमेशा डर का साया बना ही रहता है। जगह-जगह सेना की चौकियां और जांच रुकी नहीं है। २०१९ में कश्मीर राज्य का पुनर्गठन हुआ। ३७० धारा हटाकर लद्दाख-लेह को अलग कर दिया गया। जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा खत्म कर यह राज्य केंद्रशासित कर दिया गया। ओमर अब्दुल्ला राज्य के मुख्यमंत्री हैं, पर राज्य का सारा नियंत्रण ले. गवर्नर के पास है। जम्मू-कश्मीर आज पूरी तरह से केंद्र सरकार का उपनिवेश बन गया है। नौकरशाहीकेंद्रित (Bureaucratic centric) मॉडल के रूप में कश्मीर को देखना पड़ेगा। जम्मू-कश्मीर से रणबीर पीनल कोड गया और भारतीय न्याय संहिता (आईपीसी) का राज आ गया। भारत के ८९० कानून यहां लागू हुए फिर भी अभी तक लोगों का राज आया और लोकतंत्र का झंडा विधानसभा पर फहरा रहा है, ऐसा नजर नहीं आया। जम्मू-कश्मीर कैडर के अधिकारी भी निराश हैं। इस कैडर को अरुणाचल प्रदेश, गोवा, मिजोरम जैसे केंद्रशासित कैडर में विलय कर दिया गया। इसलिए बाहरी अधिकारी यहां नियुक्त किए जाते हैं और उन्हें इस राज्य की जानकारी बिल्कुल नहीं होती, यह मैंने सुना वह सच है। ‘स्थानीय’ और ‘बाहरी’ का छुपा संघर्ष प्रशासन में चल रहा है। वह लंबे समय तक रहा तो औपनिवेशिक केंद्रीय राज्य भी खोखला हो जाएगा। जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन कानून, २०१९ लागू होने के बाद भारतीय संविधान के मुताबिक, यह राज्य नए सिरे से शुरू हुआ। उससे पहले यहां राजशाही का ‘रणबीर पीनल कोड’ चलता था, वह खत्म हुआ। जमीन के मालिकाना हक को अमल में लाया गया। पश्चिम पाकिस्तान से निर्वासित होकर आए और पाक-अधिकृत कश्मीर से विस्थापित हुए लोगों को यहां नागरिक अधिकार दिए गए, पर जम्मू-कश्मीर राज्य के मूल निवासी कश्मीरी पंडित अब तक अपने घर वापस नहीं लौट पाए हैं। कश्मीरी पंडित, जो इस स्वर्ग के मूल निवासी हैं, वे जम्मू के शरणार्थी शिविरों में रहते हैं। राज्य पुनर्वास कानून से पंडितों को न्याय नहीं मिल सका है और इस बारे में कोई ठोस योजना भी दिखाई नहीं देती। फिर धारा ३७० हटाने का फायदा क्या? यह सवाल बना रहता है। कश्मीरी पंडितों की घर वापसी के नाम पर भारतीय जनता पार्टी ने हिंदुओं से वोट मांगे। इस सबका भाजपा ने सिर्फ राजनीतिक लाभ उठाया। कई कश्मीरी पंडित मुझसे जम्मू और श्रीनगर में मिले। ‘‘हमारे हिस्से में आखिर में निराशा और उपेक्षा ही आई। हमारे बच्चों का भविष्य अंधकारमय है।’’ पंडितों की यह पीड़ा दर्दनाक है।
इंजीनियरों का चमत्कार
एक बात माननी पड़ेगी कि विकास के कई कामों में तेजी आई है। दुर्गम इलाकों में सड़कें, राजमार्ग, भव्य पुलों का निर्माण हुआ है। जम्मू से श्रीनगर अब ट्रेन से साढ़े तीन घंटे में जाया जा सकता है। मैंने ‘वंदे भारत’ से जम्मू से श्रीनगर तक यात्रा की। यह ज्यादातर सफर लंबे-लंबे ‘टनल्स’ से होकर गुजरता है। उस रेलमार्ग पर ८० फीसदी टनल्स हैं। भारतीय इंजीनियरों ने कश्मीर में यह चमत्कार कर दिखाया है। उधमपुर-श्रीनगर-बारामुल्ला रेल लिंक, जोजिला टनल, कटरा-श्रीनगर कॉरिडोर जैसे नए प्रोजेक्ट जब पूरे होंगे, तब कश्मीर भारत के और करीब आया हुआ दिखेगा। बेशक ये सभी विकास परियोजनाएं आईं, फिर भी कश्मीरी लोगों का विकास हुआ क्या? यह सवाल तो है ही। क्योंकि वहां आज भी बेरोजगारी बड़े पैमाने पर है और निराशा से घिरा कश्मीरी युवा नशे की गिरफ्त में चला गया है। फिर यह आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। हर तरह का ‘नशा’ यहां उपलब्ध है। स्वर्ग पर दाग लगाने वाली यह बात है। राज्य का पुनर्गठन हुआ। नए कानून आए, कश्मीर की जमीन सबके लिए खुली हो गई, पर फिर भी भारत का एक भी बड़ा उद्योग कश्मीर तक नहीं पहुंचा। राष्ट्रभक्ति और सामाजिक कार्यों में निवेश करने वाले उद्योगपतियों को राष्ट्रकार्य समझकर यहां आना चाहिए, ऐसा नहीं सूझता। महाराष्ट्र, गुजरात समेत कई राज्यों में उद्योगपतियों की बैठकें होती हैं, निवेश पर चर्चा होती है, पर भारत के प्रधानमंत्री को इन सभी उद्योगपतियों को लेकर एक बार कश्मीर की धरती पर जाने और उन्हें निवेश करने के लिए मजबूर करने का ख्याल नहीं आया। मोदी के लाड़ले उद्योगपति गौतम अडानी को तो कम से कम यह पहल करनी चाहिए। कोई भी बड़ा उद्योग यहां नहीं आया है। कई जिलों में राष्ट्रीयकृत बैंकों की शाखाएं तक नहीं हैं। देश के ८० फीसदी सेब का उत्पादन कश्मीर में होता है, पर सेब उगाने वाला किसान संतुष्ट नहीं है। केसर, ड्राईफ्रूट का उत्पादन यहां होता है। देश में वह वितरित होता है, लेकिन उसका कोई विशेष लाभ किसानों को नहीं मिलता। केंद्रीय योजनाएं आ तो रही हैं, पर वे नए उपनिवेशवाद और नौकरशाही की लालफीताशाही में फंसी हुई हैं। मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्ला से लेकर आम जनता तक यहां सभी नाराज हैं। कश्मीर पर दिल्ली के उपनिवेशवादियों का शासन आ गया और स्वर्ग का दम घुटने लगा। सारे फैसले राजभवन से होते हैं। ग्राम पंचायतों के काम भी पैसों के अभाव में अटके पड़े हैं। धारा ३७० हटाई और जनता को लाचार बना दिया गया। भ्रष्टाचार, बेचैन सेना की गश्त आज भी खत्म नहीं हुई!
एजेंडा सफल
जम्मू, श्रीनगर, गुलमर्ग, सोनमर्ग, द्रास, कारगिल की इस यात्रा में क्या दिखा, तो धारा ३७० हटाने से भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक एजेंडा सफल हुआ। पर घाटी में धर्मभेद बढ़ गया। गुजरात के व्यापारी स्वर्ग को निगल रहे हैं, यह भावना बढ़ रही है। श्रीनगर के शेरे-कश्मीर संस्थान में एक चपरासी की जगह के लिए ५० हजार से ज्यादा आवेदन आए। उनमें ७०० पीएच.डी. धारक थे। यह ३७० हटाए गए राज्य की बेरोजगारी है। सेना से लेकर इंटेलिजेंस तक पांच-छह एजेंसियों का राज यहां चल रहा है। इसे पुलिस स्टेट कहते हैं और लोकतंत्र की रोशनी यहां नहीं दिखती। ओमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री हैं, लेकिन उन तक लोगों का पहुंचना मुश्किल हो गया है। यहां उपराज्यपाल का शासन बेहतर था, ऐसी जनराय है। राजनीतिक कार्यकर्ता सिर नहीं उठा सकते। उन्होंने किसी मुद्दे पर आवाज उठाई, आंदोलन का आह्वान किया तो भारतीय न्याय संहिता की देशद्रोह की सारी धाराएं लगाकर उन्हें जेल में डाल दिया जाता है। छात्र अपने शैक्षणिक मुद्दों पर, आरक्षण के सवालों पर, बेरोजगार अपने नौकरी के अधिकार के लिए सत्याग्रह नहीं कर सकते। कई छात्र जेल में पड़े हुए हैं। जनप्रतिनिधि अपने ही लोगों से कट गए हैं। हर किसी को शक की नजर से देखा जाता है। किस व्यक्ति को ‘एजेंसी’ ने प्लांट किया है, यह कहा नहीं जा सकता। अब्दुल्ला तीन लाख के अंतर से लोकसभा हारे। पर विधानसभा चुनाव में वे जीत गए और मुख्यमंत्री बने। कश्मीर के चुनाव ‘एजेंसी’ ने अपने कब्जे में ले लिए और उसके जरिए ओमर को मुख्यमंत्री बनाया गया, ऐसा अब श्रीनगर में खुलकर कहा जाता है। ३७० हटाने के बाद भी आज जम्मू-कश्मीर सेना और अर्धसैनिक बलों के दम पर ही स्थिर है। सरकार है, राज्यपाल हैं, विधानसभा, लोकसभा सदस्य हैं। फिर भी कश्मीर घाटी की बहुसंख्य जनता को लगता है, हमारा तो कोई भी नहीं? इस मानसिक घुटन से जम्मू-कश्मीर को मुक्ति मिलेगी क्या?
