महेश राज
चमचमाते हाइवे, गगनचुंबी इमारतें और कंक्रीट के फैलते जंगलों के बीच, भारत चुपचाप एक ऐसी प्यास की ओर बढ़ रहा है जो आनेवाले समय में देश की रफ्तार को रोक सकती है। केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट महज कुछ सूखे आंकड़े नहीं, बल्कि हमारे भविष्य की एक भयावह चेतावनी है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश के १६६ प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर घटकर कुल क्षमता के ४५ फीसदी से भी कम रह गया है। चिंता की बात यह नहीं है कि पानी कम हुआ है, क्योंकि गर्मियों में ऐसा अक्सर होता है। असली फिक्र इस बात की है कि फरवरी से अब तक यानी महज इन कुछ महीनों में इसमें २२ फीसदी की भारी गिरावट आई है। यह रफ्तार सामान्य मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि एक गहरे और स्थायी जल संकट का अलार्म है।
यदि इस चेतावनी को अब भी अनसुना किया गया तो इसका खामियाजा केवल पेयजल की किल्लत के रूप में नहीं भुगतना होगा। यह संकट हमारी पूरी अर्थव्यवस्था और जीवन चक्र को अपनी चपेट में ले लेगा। दक्षिण भारत में स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर है, जहां जलाशयों में केवल ३३ प्रतिशत पानी बचा है। गंगा, गोदावरी और नर्मदा जैसे बड़े नदी बेसिन आधे खाली हो चुके हैं, जबकि कृष्णा और पूर्वी तटीय बेसिनों की हालत और भी बदतर है। पानी की यह कमी सीधे तौर पर देश में एक त्रिकोणीय संकट को जन्म देगी। पहला अन्न संकट, क्योंकि पानी की कमी से खरीफ फसलों की बुआई प्रभावित होगी और खेती ठप पड़ जाएगी। दूसरा ऊर्जा संकट, क्योंकि नदियों का प्रवाह घटने से जलविद्युत उत्पादन गिर जाएगा। तीसरा अस्तित्व का संकट, क्योंकि आंकड़े बताते हैं कि वर्ष २०११ में जो प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता १,५४५ घन मीटर थी, वह २०३१ तक घटकर महज १,३०० घन मीटर रह जाएगी। यह जल की कमी वाले देश से जल संकट वाले देश बनने की ओर बढ़ते कदम हैं।
अक्सर ऐसी स्थितियों में सारा दोष कमजोर मानसून या प्रकृति के मथे मढ़ दिया जाता है। लेकिन सच यह है कि इस संकट के असली जिम्मेदार हम खुद और हमारा लचर जल प्रबंधन है। हमने विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति के सुरक्षा तंत्र को नष्ट कर दिया है। नदियों के वैâचमेंट एरिया में अंधाधुंध वनों की कटाई, मिट्टी का कटाव और अनियोजित निर्माण ने पानी को रोकने की प्राकृतिक क्षमता को खत्म कर दिया है। सबसे बड़ा अपराध हमारे शहरों और गांवों में तालाबों, झीलों और आर्द्रभूमियों (वेटलैंड्स) के अतिक्रमण के रूप में हुआ है। जहां कभी पानी ठहरता था, वहां आज कंक्रीट की संरचनाएं खड़ी हैं। जब जमीन को सीमेंट और डामर से पूरी तरह ढंक दिया जाएगा तो बारिश का पानी धरती के भीतर समाने के बजाय बहकर बर्बाद हो जाएगा।
