के.पी. मलिक
लोकतंत्र में कई बार चुनावी घोषणापत्र से ज्यादा असर एक बयान कर देता है। सत्ता और संस्थानों में बैठे लोग जब जनता की पीड़ा को समझने के बजाय उसका मजाक उड़ाने लगते हैं, तब शब्द केवल शब्द नहीं रहते, वे आक्रोश की चिंगारी बन जाते हैं। ‘कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी)’ जैसी डिजिटल राजनीतिक अवधारणा उसी चिंगारी से निकली हुई प्रतीत होती है। यह भले ही अभी सोशल मीडिया का व्यंग्य लगे, लेकिन इसके पीछे छिपा असंतोष बिल्कुल वास्तविक है।
भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादीवाले देशों में गिना जाता है, लेकिन यही युवा सबसे ज्यादा असुरक्षित, निराश और उपेक्षित महसूस कर रहा है। करोड़ों पढ़े-लिखे नौजवान वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, पेपर लीक झेलते हैं, भर्ती घोटालों से गुजरते हैं और अंत में या तो बेरोजगारी का शिकार होते हैं या अस्थायी रोजगार के सहारे जीवन काटने को मजबूर होते हैं। ऐसे माहौल में यदि किसी संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति युवाओं के संघर्ष को अपमानजनक उपमा से जोड़ता हुआ दिखाई दे तो यह केवल एक बयान नहीं रहता, बल्कि व्यवस्था की मानसिकता का प्रतीक बन जाता है।
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ दरअसल, उसी मानसिकता के खिलाफ डिजिटल प्रतिरोध का रूप है। यह उन युवाओं का तंज है, जिन्हें बार-बार ‘अयोग्य’, ‘अधिक अपेक्षाकारी’ या ‘भीड़’ कहकर खारिज किया गया। यह उस व्यवस्था पर कटाक्ष है, जो बेरोजगारी के आंकड़ों से ज्यादा अपनी छवि की चिंता करती है। सोशल मीडिया ने पहली बार उन लोगों को आवाज दी है जिनकी नाराजगी टीवी स्टूडियो और संसद की बहसों में जगह नहीं पाती। इसलिए सीजेपी जैसी अवधारणाएं केवल मीम नहीं हैं, वे लोकतंत्र के भीतर बढ़ती दूरी का संकेत हैं।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि आखिर देश का युवा इतनी आसानी से व्यवस्था-विरोधी व्यंग्य के साथ क्यों जुड़ जा रहा है? इसका उत्तर केवल किसी एक बयान में नहीं, बल्कि लंबे समय से जमा होती निराशा में छिपा है। जब रोजगार के अवसर कम हों, सरकारी भर्तियां वर्षों अटकी रहें, निजी क्षेत्र अस्थिर हो और महंगाई लगातार बढ़ती जाए, तब युवाओं के भीतर संस्थानों के प्रति सम्मान की जगह अविश्वास पैदा होना स्वाभाविक है। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने से नहीं चलता, बल्कि जनता के आत्मसम्मान को बनाए रखने से चलता है और जब वही आत्मसम्मान आहत होता है, तब व्यंग्य आंदोलन का रूप लेने लगता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि आज की राजनीति तेजी से डिजिटल हो रही है। पहले आंदोलन सड़कों पर जन्म लेते थे, अब हैशटैग और मीम से भी जनमत बन रहा है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ इस नई डिजिटल राजनीति की झलक हो सकती है, जहां युवा पारंपरिक राजनीतिक दलों से निराश होकर अपनी भाषा और अपने प्रतीक खुद गढ़ रहे हैं। यह व्यवस्था के लिए चेतावनी है कि जनता को केवल आंकड़ों और भाषणों से नहीं, संवेदनशीलता और सम्मान से भी संभालना पड़ता है।
दरअसल, लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं होती जब जनता गुस्से में हो, बल्कि वह होती है जब जनता व्यवस्था का मजाक उड़ाने लगे। क्योंकि व्यंग्य अक्सर उस विश्वास के टूटने का संकेत होता है, जिस पर लोकतंत्र टिका होता है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ शायद कोई वास्तविक राजनीतिक दल न हो, लेकिन यह उस वास्तविक पीड़ा का प्रतीक जरूर है जिसे देश का बेरोजगार युवा हर दिन महसूस कर रहा है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
