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संपादकीय : देश जल रहा है, नीरो चॉकलेट बांट रहा है!

‘मेलोडी’ चॉकलेट को लेकर भारत में भारी हंगामा मचा हुआ है। भारत में आर्थिक संकट का तूफान मंडरा रहा है। लोग पेट्रोल-डीजल और एलपीजी गैस की कतारों में खड़े हैं। ऐसे संकट के समय किसी भी नेतृत्व को स्वदेश में रहकर लोगों को ढांढस बंधाना चाहिए था, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री इटली चले गए। वे वहां की प्रधानमंत्री मेलोनी के लिए भारत से मेलोडी चॉकलेट का तोहफा लेकर गए। इस पर देश में आलोचना हो रही है। आर्थिक संकट दस्तक दे रहा है। किसान, युवा, महिलाएं… सभी आंसू बहा रहे हैं। व्यापारी और छोटे दुकानदार बेहाल हैं। ‘नीट’ के पेपर लीक हो चुके हैं। मणिपुर जल रहा है। ऐसे संकट काल में मोदी इटली जाकर ‘चॉकलेट’ बांट रहे हैं। इस पर शरद पवार का कहना है कि श्रीमान मोदी दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने का काम कर रहे हैं। इटली की महिला प्रधानमंत्री को चॉकलेट देना, सेल्फी खींचना और संकटग्रस्त देश को अधर में छोड़कर विदेशी दौरे करना इससे देश की प्रतिष्ठा वैâसे बढ़ी, यह एक बार पवार साहब को लोगों को समझाना चाहिए। मोदी का मेलोनी मादाम के लिए चॉकलेट ले जाना आलोचना का विषय नहीं है। विषय तो यह है कि देश को किफायत और सब्र का उपदेश देनेवाले महाशय खुद मेलोनी के साथ ‘रील्स’ बनाने में मशगूल हैं, आलोचना इस बात की है। जब प्रधानमंत्री विदेशी दौरे पर हों तब उन पर टीका-टिप्पणी नहीं करनी चाहिए, लेकिन जब प्रधानमंत्री विदेश जाकर वास्तव में क्या कर रहे हैं और उनका व्यवहार वैâसा है, यह चर्चा का विषय बन जाए, तब उस पर बोलना ही पड़ेगा। मुख्यमंत्री फडणवीस का कहना है कि प्रधानमंत्री के इटली जैसे देशों में जाने से कुछ रणनीतिक समझौते हुए हैं (अब सच क्या है, यह वही जानें!) जिससे अगले १०-२० साल के लिए भारत का भविष्य सुरक्षित हो गया है, ऐसा उनका कहना है। भारत का भविष्य सुरक्षित करने के लिए प्रधानमंत्री को इटली की मेमसाहब को ‘चॉकलेट’ देना पड़ता है, सेल्फी खिंचवानी पड़ती है। इस बहाने
नई वैश्विक विदेश नीति का
पता चला। हमारे प्रधानमंत्री मेलोनी मेमसाहब के लिए चॉकलेट लेकर गए। यदि वे फाफड़ा, ढोकला, खांडवी, आलूवड़ी या भाकरवड़ी (चितले की) ले गए होते तो भी चल जाता। यदि वे मेमसाहब को रबड़ी और जलेबी का स्वाद चखाते, तो भी देश उनका स्वागत करता; लेकिन जब देश जल रहा हो और प्रधानमंत्री यूरोप में मौज-मस्ती कर रहे हों, तो यह चिंता की बात है। अगर मोदी इस संकट के समय भारत छोड़कर नॉर्वे, इटली, नीदरलैंड जैसे देशों में नहीं गए होते तो क्या भारत की प्रतिष्ठा का कोई बहुत बड़ा पहाड़ टूट जाता? इटली की आबादी कुल ५.८ करोड़ (५८ मिलियन) है। दिल्ली-मुंबई की ट्रेनों और मेट्रो में इससे कहीं ज्यादा लोग रोजाना सफर करते हैं। इटली यूरोप में सबसे बुजुर्ग आबादी वाला देश है, जबकि मोदी तो महज ७५ वर्ष के हैं। इटली की सैन्य ताकत १.६५ लाख है, उनकी सेना बहुत बड़ी नहीं है। फिर भी उनकी सेना की गुणवत्ता, आधुनिकता और नौसैनिक ताकत अच्छी है। इटली की ‘मुद्रा’ मजबूत है और खुद प्रधानमंत्री मेलोनी एक कड़क नेता हैं। ईरान-इजरायल और अमेरिकी युद्ध के संदर्भ में मेलोनी ने एक मजबूत रुख अपनाया और युद्ध भड़काने वालों को खरी-खोटी सुनाने का साहस दिखाया। ट्रंप की धमकियों या दबाव की मेलोनी ने रत्ती भर परवाह नहीं की। जब राष्ट्रपति ट्रंप ने पोप साहब पर फिजूल टिप्पणी की, तब मेलोनी दृढ़ता से पोप साहब के पीछे खड़ी रहीं। उन्होंने साफ कहा कि दुनिया को इजरायल के आतंकवादी रवैये को स्वीकार नहीं करना चाहिए। उस समय श्रीमान मोदी इस गंभीर वैश्विक मुद्दे पर मुंह में दही जमाकर चुप बैठे रहे और अब चॉकलेट लेकर मेलोनी से मिलने पहुंच गए। यह है उनकी विदेश नीति। मोदी समर्थक दावा कर रहे हैं कि इटली के साथ भारत की ‘स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ और
बीस अरब डॉलर के
व्यापारिक समझौते हुए हैं। लेकिन क्या इन समझौतों से किसानों की आत्महत्याएं रुकेंगी? क्या महिलाओं को रसोई गैस, युवाओं को रोजगार और जनता को ईंधन मिलेगा? जब भारत संकट में था, तब इटली के नेता कभी भारत के साथ मजबूती से खड़े दिखाई नहीं दिए। और मोदी ने मेलोनी को चॉकलेट का डिब्बा दे दिया इसलिए वे यह बयान नहीं देने वालीं कि पूरा कश्मीर भारत का ही हिस्सा है, यह बात ध्यान में रखनी चाहिए। इटली के साथ रक्षा समझौते होने का सीधा मतलब यह है कि रक्षा क्षेत्र में हमारी आत्मनिर्भरता इटली जैसे देश पर टिकी है। इसलिए यदि कल को कोई यह कह दे कि नए रूप में ‘वंदे-माता-रोम’ का उदय हुआ है, तो इसका मोदी भक्तों के पास क्या जवाब है? रोम इटली की राजधानी है। इतिहास में एक प्रसिद्ध कहावत है कि ‘जब रोम जल रहा था, तब नीरो बंसी बजा रहा था।’ प्रâांसीसी क्रांति के इतिहास से जुड़ा प्रâांस की तत्कालीन रानी मैरी एंटोनेट का गरीबों को दिया गया वह बयान भी अक्सर दोहराया जाता है कि ‘अगर रोटी नहीं मिलती, तो केक खाओ।’ आज वही दृश्य भारत में उभरता हुआ दिखाई दे रहा है, बस किरदार बदल गए हैं। यहां भारत ईंधन की किल्लत की आग में जल रहा है। जनता कतारों में खड़ी है। चूल्हे ब्ाुझ चुके हैं। पेट्रोल पंपों पर ‘दंगे’ भड़कने की आशंका है। विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव है। सोने की खरीद पर अघोषित पाबंदी है और ऐसे में ये महाशय आर्थिक संकट की घोषणा करके खुद इटली में ‘चॉकलेट’ बांट रहे हैं। यह देश की प्रतिष्ठा बढ़ानेवाला कृत्य नहीं, बल्कि एक गैर-जिम्मेदार और ढोंगी नेता की नौटंकी है। अगर लोगों ने उनकी तुलना ‘नीरो’ से की और यह आलोचना की कि ‘देश जल रहा है और यहां का ‘नीरो’ चॉकलेट बांट रहा है,’ तो भक्तों को भड़कने की कोई जरूरत नहीं है! यह सच ही है।

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