मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात : पसमांदा की उम्मीदें और सियासत का निर्मम सच

इस्लाम की बात : पसमांदा की उम्मीदें और सियासत का निर्मम सच

सैयद सलमान
मुंबई

लोकतंत्र में जब सत्ता बदलती है तो प्राथमिकताओं का बदलना स्वाभाविक है, लेकिन जब प्राथमिकताओं के बदलने से सामाजिक न्याय की स्थापित परिभाषाएं बदलने लगें तो व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठने लाजिमी हैं।
तुष्टीकरण के नाम पर!
पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली नई भाजपा सरकार का हालिया निर्णय इसका जीवंत उदाहरण है। राज्य सरकार द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण को १७ प्रतिशत से घटाकर महज ७ प्रतिशत करने और पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में शामिल की गईं कई मुस्लिम उप-जातियों को इस सूची से बाहर करने का पैâसला सिर्फ एक प्रशासनिक या कानूनी कदम नहीं है। यह एक ऐसा राजनीतिक संकेत है, जिसने नीति और नीयत दोनों को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
अदालती पैâसलों की आड़ लेकर इस निर्णय को कानूनी रूप से सही ठहराने की पुरजोर कोशिशें की जा रही हैं। सरकार का तर्क है कि वह केवल कलकत्ता उच्च न्यायालय के पुराने आदेश का अनुपालन कर रही है। कानूनन यह सही हो सकता है, परंतु राजनीति और सामाजिक सरोकार महज शुष्क कानूनी धाराओं से नहीं चलते। जब कोई चुनी हुई सरकार सत्ता में आती है तो उसका दायित्व समाज के हर तबके के अधिकारों की रक्षा करना होता है। पूर्ववर्ती सरकार के पैâसलों को ‘तुष्टीकरण’ का नाम देकर खारिज कर देना आसान है, लेकिन उस प्रक्रिया में जिन गरीब, जुलाहे, कुंजड़े और कसाई जैसी बेहद पिछड़ी पृष्ठभूमि से आनेवाले लोगों का हक छीना गया, क्या सरकार के पास उनके उत्थान के लिए कोई वैकल्पिक ठोस योजना है? अगर पूर्ववर्ती सरकार की सूची में तकनीकी खामियां थीं तो उन्हें दुरुस्त करने के बजाय पूरी व्यवस्था को ही संकुचित कर देना कहां का न्याय है?
कथनी और करनी…!
यह घटनाक्रम भाजपा की उस राष्ट्रीय रणनीति पर भी एक बड़ा और असहज करने वाला सवालिया निशान लगाता है, जिसके तहत वह पिछले कुछ वर्षों से ‘पसमांदा मुसलमानों’ के प्रति अगाध स्नेह और उनकी सामाजिक-आर्थिक भलाई की दुहाई देती रही है। बड़े-बड़े मंचों से बार-बार यह घोषणा की गई कि मुस्लिम समाज का एक बड़ा हिस्सा ‘पसमांदा’ सदियों से शोषित और उपेक्षित रहा है और भाजपा उनके सामाजिक न्याय की असली अलमबरदार बनेगी। उन्हें मुख्यधारा में लाने के दावे किए गए। परंतु जैसे ही बंगाल की सत्ता में पहली परीक्षा की घड़ी आई, भाजपा की कथनी और करनी का यह विरोधाभास खुलकर सतह पर आ गया। यानी पसमांदा मुसलमानों के लिए वह हमदर्दी सिर्फ चुनावी रैलियों और अल्पसंख्यक मोर्चों के सम्मेलनों तक ही सीमित थी। जब उनके वास्तविक हकों को नीतिगत स्तर पर बरकरार रखने या उन्हें नया वैधानिक संरक्षण देने का समय आया तो सरकार ने तत्परता से अपने हाथ खींच लिए। यह निर्णय सबूत है कि सरकार को सिर्फ चुनावी समीकरणों को साधना है, उसे पसमांदा के हितों की बलि चढ़ाने में जरा भी संकोच नहीं है।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ी सीख और चेतावनी स्वयं पसमांदा मुसलमानों के लिए है। यह वर्ग लंबे समय से दोहरी मार झेल रहा है। एक तरफ उनके अपने ही समाज के रसूखदार और रईस तबके ने उन्हें आगे नहीं बढ़ने दिया। दूसरी तरफ, धर्मनिरपेक्षता का चोगा ओढ़े राजनीतिक दलों ने उन्हें सिर्फ एक सुरक्षित ‘वोट बैंक’ समझा। रही बात भाजपा की तो उसने पसमांदा कार्ड खेलकर इस बड़े वर्ग को एक नई उम्मीद तो दिखाई, लेकिन बंगाल के इस ताजा पैâसले ने उस उम्मीद के शीशे को चकनाचूर कर दिया।
राजनीतिक वादों का खोखलापन
पसमांदा मुसलमानों को अब यह कड़वा सच स्वीकार करना होगा कि सियासत में कोई किसी का सगा नहीं होता। जब तक वे खुद को ‘चुनावी फुटबॉल’ बनने देंगे, तब तक कभी तुष्टीकरण के नाम पर तो कभी बहुसंख्यक तुष्टीकरण के नाम पर उनके अधिकारों के साथ ऐसा ही खिलवाड़ होता रहेगा। चाहे कोई दल धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करे या कोई दल उनका मसीहा बनने का स्वांग रचे, सत्ता की चौखट पर हर कोई अपनी राजनीतिक सहूलियत देखता है। पसमांदा समाज को अब भावुकता और राजनीतिक नारों के सम्मोहन से बाहर निकलना होगा। उन्हें अपनी लड़ाई किसी राजनीतिक बैसाखी के भरोसे नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र चेतना, शिक्षा और संवैधानिक अधिकारों के सजग बोध के साथ खुद लड़नी होगी।
बंगाल का यह आरक्षण संशोधन एक गंभीर मुद्दा है। सामाजिक न्याय की अवधारणा को महज चुनावी लाभ-हानि के तराजू पर नहीं तौला जा सकता। शुभेंदु सरकार को यह समझना होगा कि राजधर्म किसी वर्ग विशेष को हाशिए पर धकेलने से नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने से सिद्ध होता है। यदि वास्तव में मंशा केवल कानूनी विसंगतियों को दूर करने की है तो सरकार को अविलंब एक पारदर्शी और निष्पक्ष पिछड़ा वर्ग आयोग बनाकर इन उप-जातियों के पिछड़ेपन का नए सिरे से मूल्यांकन कराना चाहिए, ताकि न्याय की मूल भावना जीवित रह सके। अन्यथा, यह निर्णय इतिहास में सामाजिक न्याय के संकुचन और राजनीतिक वादों के खोखलेपन के एक और अध्याय के रूप में ही दर्ज होगा।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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