नवीन सी. चतुर्वेदी
घुटरू यै कैसा हो-हल्ला है रह्यौ है? इतनों सोर? बालक’न के इंताम हैं, विनें पढ़ाई-लिखाई करनी है, ये लड़वे वारे’न कों कछू सूझै है कि नाँय? त्यौहार’न पै तौ सबके सब बालक’न की पढ़ाई-लिखाई और मरीज’न की बिमारि’न कौ पीटनों पीटते रहें! या समें काहु भलेमानुस की समझ में नांय आय रही? सबके सब घोड़ा बेच कें सोय गये हैं का? का बताओं बत्तो, इट हैपन्स ओनली इंडिया। एक पूरी की पूरी फौज है जाकों हमेसा यै लगै है कि अपने महौल्ला के त्यौहार’न कौ विरोध करंगे तौ ही पढ़े-लिखे कहामंगे! वैसें तैंनें तीर एकदम निसाने पै मारौ है। ध्वनि-परदूसन तौ देसी त्यौहार’न सों ही होवै है! न काहू कॉन्सर्ट सों होवै है, न काहू स्पोर्ट-विस्पोर्ट सों और जूतम-पैजार’न सों तौ हैवे कौ सवाल ही नांय उठै!
महौल्ला वारे सब के सब या समें जूतमपैजार में जुते भये हैं। कछू कर रहे हैं और कछू देख-देख कें अनन्द लै रहे हैं। एक्च्युअली घासीराम के मौड़ा हक्कू और झांसीराम की मौड़ी बक्कू में तूतू मैंमैं सुरू भयी हुती। धीरें-धीरें सबरे महौल्ला वारे तमासे कौ हिस्सा बन गये। लेकिन घुटरू कल्ल संजा तौ ये हक्कू-बक्कू दौनों नदी किनारें झख मार रहे हुते मतबल मछली फाँस रहे हुते! हंस-हंस कें बोल-बतराय रहे हुते! एक-दूसरे के संग सेल्फी हू लै रहे हुते! आज अचानक का है गयौ जो महौल्ला कों पानीपत कौ मैदान बनाय डारौ है?
बत्तो तू कल्ल की का बात कर रही है? यै तौ इनकौ रोज कौ किस्सा है। नित्त सूरज उगते ही महौल्ला वारे’न कों चना के झाड़ पै चढ़ाय देमें हैं और फिर दिन मुंदते ही नसेनी (सीढ़ी) खेंच, खुद्द ऐस-मौज करवे निकस जामें हैं! महौल्ला वारे अपनी खुद्द की जान जोखिम में डार कें जैसें तैसें नीचें उतरें हैं मगर अगले दिन फिर वौ ही रिपीट! फिर वौ ही तमासौ! कमाल है घुटरू, ये महौल्ला वारे ऊत के पाये हैं का? जो हरदिन उल्लू बनते रहें! इनकों हकीकत समझ में नांय आवै है का?
बत्तो महौल्ला वारे समझ जाते तौ रोज-रोज उल्लू बनते ही क्यों? कभू कभू तौ ऐसौ लगै है जैसें कि यै तमासौ महौल्ला वारे’न के लिएं अफीम के नसा जैसौ है गयौ है! वैसें बड़े ही भोरे-भारे हैं अपने महौल्ला वारे! जो हू नैंक मन की सी बात करवे लगै, वाय भगवान जैसौ समझ लेमें हैं!
जिसमें कुछ अच्छा दिखा, उसके कसीदे पढ़ दिये
ऐरे-गैरों को भी अल्लामा समझ बैठे थे हम
