रत्ना भदौरिया
यह लेख आधुनिक तकनीक, मोबाइल और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से युवा पीढ़ी पर पड़ रहे नकारात्मक प्रभावों को उजागर करता है।
आज तकनीक ने दुनिया को मुट्ठी में समेट दिया है, लेकिन ज्ञान और विकास का साधन बनने के बजाय यह युवाओं को भीतर से खोखला कर रही है। रील्स, सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग की लत के कारण युवाओं की दिनचर्या पूरी तरह बदल चुकी है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक वे स्क्रीन से चिपके रहते हैं। कुछ सेकंड के वीडियो से मिलने वाली उत्तेजना ने युवाओं की एकाग्रता को खत्म कर दिया है, जिससे वे पढ़ाई या प्रतियोगी परीक्षाओं पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहे हैं। ‘बस पांच मिनट’ की यह लत धीरे-धीरे उनके पूरे भविष्य को निगल रही है।
ऑनलाइन गेमिंग और आभासी पहचान का संकट
ऑनलाइन गेमिंग की लत ने इस संकट को और जानलेवा बना दिया है। गेम में हारने पर युवा अवसाद और गुस्से का शिकार हो रहे हैं, यहां तक कि आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम भी उठा रहे हैं। इसके साथ ही, सोशल मीडिया पर लाइक्स और फॉलोअर्स को ही पहचान मान लेना एक अन्य खतरनाक प्रवृत्ति बन चुकी है। दूसरों की दिखावटी और चमकदार जिंदगी से अपनी तुलना करके युवा हीन भावना, तनाव और अकेलेपन से घिर रहे हैं।
वास्तविक रिश्तों में दूरी और मानसिक अवसाद
इस वर्चुअल दुनिया ने वास्तविक रिश्तों और संवाद को खत्म कर दिया है। एक ही घर में रहने के बावजूद लोग आपस में बात करने के बजाय मोबाइल में खोए रहते हैं। डिजिटल दुनिया में हजारों ‘प्रâेंड्स’ होने के बाद भी वास्तविक जीवन में युवा अकेले हैं। सोशल मीडिया की नकली सफलता को सच मानने के कारण युवाओं में वास्तविक संघर्षों का सामना करने की क्षमता कमजोर हो रही है, जिससे अनिद्रा, चिड़चिड़ापन और अवसाद जैसी मानसिक बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। तकनीक या सोशल मीडिया स्वत: बुरे नहीं हैं, बशर्ते उनका उपयोग सही कार्यों के लिए हो। समस्या तब पैदा होती है जब मनुष्य तकनीक का गुलाम बन जाता है। इस संकट से बचने के लिए युवाओं को डिजिटल संतुलन बनाना होगा और अपनी प्राथमिकताओं को समझना होगा। साथ ही, माता-पिता को भी बच्चों को डांटने के बजाय उनके साथ संवाद बढ़ाना होगा। यदि समय रहते इस लत को नहीं सुधारा गया, तो आने वाली पीढ़ी मानसिक रूप से कमजोर और दिशाहीन हो जाएगी। सोशल मीडिया को जीवन का साधन बनाना चाहिए, जीवन का उद्देश्य नहीं।
(रचनाकार युवा कवि-कथाकार हैं)
