अनिल तिवारी
भारतीय रुपए की कमजोरी अब केवल डॉलर के मुकाबले गिरावट की कहानी नहीं रह गई है। यदि भारतीय रुपया पाकिस्तानी रुपए और बांग्लादेशी टका के मुकाबले भी कमजोर दिख रहा है, तो यह संकेत है कि दबाव केवल बाहरी नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था की लागत संरचना, आयात निर्भरता और नीति-संतुलन से भी जुड़ा है, जो आम हिंदुस्थानी की क्रय शक्ति अर्थात परचेजिंग पावर को तबाह कर रहा है।
रुपए पर सबसे बड़ा दबाव डॉलर और कच्चे तेल से आता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। जब कच्चा तेल महंगा होता है और रुपया कमजोर होता है, तो भारत को उसी तेल के लिए ज्यादा रुपये चुकाने पड़ते हैं। पश्चिम एशिया में तनाव और तेल कीमतों में तेजी ने एशियाई मुद्राओं पर दबाव बढ़ाया है, जबकि भारत जैसे तेल-आयातक देशों पर इसका असर अधिक गंभीर है। डॉलर के मुकाबले रुपए के ९६ के आसपास पहुंचने के बाद आयातित महंगाई का खतरा बढ़ जाता है। रुपये में हाल की राहत भी रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप से आई है, लेकिन एशियाई मुद्राओं की कमजोरी, आयातकों की डॉलर मांग और मजबूत डॉलर सूचकांक आगे भी दबाव बना सकते हैं।
इसका सीधा असर आम आदमी पर पड़ रहा है। पेट्रोल-डीजल महंगा होता है, तो परिवहन महंगा होता है। परिवहन महंगा होता है, तो सब्जी, दाल, दूध, फल, निर्माण सामग्री और रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी होती हैं। ऊपर से जीएसटी, उत्पाद शुल्क, सेस और स्थानीय कर व्यवस्था उपभोक्ता की जेब पर अतिरिक्त बोझ डालती है। यानी आम भारतीय की कमाई भले उतनी ही रहे, लेकिन उसकी खरीदने की क्षमता घटती जा रही है।
जहां तक राहत का सवाल है, तो आने वाले समय में भी इसमें किसी बड़े सुधार के संकेत नहीं मिल रहे हैं। जानकार मानते हैं कि भविष्य में रुपए की स्थिति तीन बातों पर निर्भर करेगी — कच्चे तेल की कीमत, डॉलर की मजबूती और रिजर्व बैंक की हस्तक्षेप क्षमता। यदि तेल ऊंचा रहा और पूंजी निकासी जारी रही, तो रुपया और दबाव में रह सकता है। इस पर यदि सरकार ने कोई राहत नहीं दी और पूरा नुकसान जनता के कंधों पर डाल दिया, तो हिंदुस्थानियों की क्रय शक्ति पर संकट और भी गहरा सकता है। लिहाजा, इस वक्त जनता को समझदारी से खर्च करने की जरूरत है। पैनिक बाइंग स्थिति को और भी संकट में डाल सकती है।
डॉलर के मुकाबले रुपये की लगातार कमजोरी के बीच अर्थशास्त्री और वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ. अरविंद पनगढ़िया ने आरबीआई को सलाह दी है कि रुपये के १०० प्रति डॉलर तक पहुंचने की स्थिति से घबराने की जरूरत नहीं है। उनके अनुसार, १०० केवल एक मनोवैज्ञानिक संख्या है, आर्थिक संकट का संकेत नहीं। पनगढ़िया का कहना है कि विनिमय दर को बाजार की परिस्थितियों के अनुसार चलने देना चाहिए और केवल संख्या देखकर हस्तक्षेप करना गलत होगा। कमजोर रुपया निर्यात को प्रतिस्पर्धी बना सकता है, बशर्ते महंगाई और बाहरी दबावों पर संतुलित नजर रखी जाए। कुल मिलाकर पनगड़िया के अनुसार रुपए और जनता दोनों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाए।
पैनिक बाइंग से ही समझदारी है
देश के कई हिस्सों में पेट्रोल पंपों पर अचानक भीड़ बढ़ने और खासकर डीजल की मांग में उछाल आने के बाद लोगों के बीच ईंधन की कमी को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। सोशल मीडिया और स्थानीय अफवाहों ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। लेकिन भारत सरकार के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि देश में ईंधन की कोई कमी नहीं है। सरकार ने लोगों से अपील की है कि वे घबराहट में जरूरत से ज्यादा पेट्रोल या डीजल खरीदने से बचें। ऐसे समय में सबसे जरूरी है संयम और समझदारी।
पैनिक बाइंग किसी समस्या का समाधान नहीं करती, बल्कि सामान्य व्यवस्था को भी बिगाड़ देती है। जब लोग जरूरत से अधिक डीजल खरीदने लगते हैं, तो पेट्रोल पंपों पर अनावश्यक भीड़ बढ़ जाती है। इससे आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव पड़ता है और जहां वास्तव में जरूरतमंद लोग होते हैं — किसान, ट्रांसपोर्टर, एंबुलेंस और आवश्यक सेवाओं से जुड़े लोग — उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। घबराहट में की गई खरीदारी वैसी ही है, जैसे दलदल में फंसकर हाथ-पैर मारना। जितना अधिक घबराएंगे, उतनी ही स्थिति उलझेगी। यदि हर व्यक्ति अपनी सामान्य जरूरत के अनुसार ही ईंधन खरीदे, तो व्यवस्था सुचारु बनी रहती है। लेकिन अफवाहों के आधार पर टैंक भरवाना, ड्रम में डीजल जमा करना या बार-बार पंप पर जाना पूरी व्यवस्था को अव्यवस्थित कर सकता है।
लोगों को चाहिए कि वे संयम से काम लें। सरकारी सूचना, तेल कंपनियों और विश्वसनीय समाचार स्रोतों पर भरोसा करें। सोशल मीडिया पर पैâल रही अपुष्ट खबरों, वीडियो और संदेशों को आगे न बढ़ाएं। बिना पुष्टि के कोई संदेश साझा करना भी संकट को बढ़ाने जैसा है।
साथ ही यह सरकार और तेल कंपनियों की भी जिम्मेदारी है कि वे नियमित रूप से स्थिति स्पष्ट करती रहें, ताकि भ्रम की गुंजाइश न रहे। वहीं, नागरिकों की जिम्मेदारी है कि वे धैर्य रखें और जरूरत भर ही ईंधन लें। ईंधन की उपलब्धता तभी सामान्य बनी रहेगी, जब जनता भी सामान्य व्यवहार करेगी। संकट से बचने का रास्ता अफवाह नहीं, संयम है।
