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चुनावी रेवड़ियों पर खर्च डाले हजारों करोड़ … १.७५ लाख बच्चे रोटी को मोहताज!

वोटों के लिए किसने छीना अनाथ बच्चों का निवाला?
साल भर से फंड के इंतजार में हैं अनाथालय
सुनील ओसवाल / मुंबई
महाराष्ट्र की राजनीति में संवेदनहीनता की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया है। आरोप है कि फडणवीस सरकार ने चुनावी फायदे के लिए शुरू की गई ‘लाडली बहन योजना’ को बचाने के लिए अनाथ बच्चों के हक का पैसा ही दूसरी तरफ मोड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि राज्य के करीब पौने दो लाख अनाथ और बेसहारा बच्चे पिछले एक साल से सरकारी मदद के लिए दर-दर भटक रहे हैं।
उल्लेनीय है कि महायुति ने चुनावी रेवड़ियों पर हजारों करोड़ खर्च कर डाला। अब राज्य के १.७५ लाख बच्चे रोटी को मोहताज हो गए हैं। महायुति ने वोटों के लिए अनाथ बच्चों का निवाला छीन लिया है। अब अनाथालय सालभर से फंड के इंतजार में हैं। बता दें कि जिन मासूमों के सिर से पहले ही मां-बाप का साया उठ चुका है, अब उनके सिर से सरकार का हाथ भी हट गया है।

आर्थिक सहायता अटकी
बालपोषण योजना के तहत मिलनेवाली आर्थिक सहायता पिछले १२ महीनों से अटकी पड़ी है। हजारों बच्चे ऐसे हैं जिनकी पढ़ाई रुक गई, कईयों के पास दवाई के पैसे नहीं तो कई बच्चों के सामने दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
बालपोषण योजना की निधि डायवर्ट
सूत्रों का दावा है कि राज्य सरकार ने ‘लाडली बहन योजना’ के लिए भारी फंड जुटाने के चक्कर में बालपोषण योजना की निधि दूसरी तरफ मोड़ दी यानी जिन पैसों से अनाथ बच्चों का जीवन चलना था, वही पैसा अब राजनीतिक योजनाओं में खर्च होने के आरोपों में घिर गया है।

अनाथ बच्चों का नहीं बचा कोई नाथ!
वोट बैंक के लिए भविष्य से खिलवाड़

राज्य में बालपोषण योजना के लाभार्थियों को हर महीने २,२५० रुपए दिए जाते हैं, जबकि कोरोना में अनाथ हुए बच्चों को ४ हजार रुपए की मदद तय है, लेकिन पिछले एक साल से हजारों बच्चों के खातों में एक रुपया तक जमा नहीं हुआ।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार ने वोट बैंक को बच्चों के भविष्य से बड़ा मान लिया। एक कार्यकर्ता ने तीखा सवाल उठाया- क्या महाराष्ट्र में अब अनाथ बच्चों का कोई नाथ नहीं बचा?
सरकार महिलाओं को आर्थिक मदद देकर राजनीतिक तालियां बटोर रही है, लेकिन दूसरी तरफ अनाथ बच्चों की आंखों में भूख, बेबसी और इंतजार साफ दिखाई दे रहा है। अब यह मामला सिर्फ आर्थिक गड़बड़ी का नहीं, बल्कि इंसानियत और संवेदनाओं के दिवालियापन का बनता जा रहा है। विपक्ष भी सरकार पर हमलावर हो गया है और पूछ रहा है- क्या सत्ता बचाने के लिए मासूम बच्चों का हक छीना गया?

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