मनमोहन सिंह
-अमेरिकी राजनीति का नया मोड़
संत कबीर दास जी ने सदियों पहले चेताया था कि किसी भी चीज की ‘अति’ अंतत: विनाश का कारण बनती है। अति बोलना हो, अति चुप रहना हो, अति बरसना हो या अति धूप-हर अति अपने साथ संकट लेकर आती है। आज अमेरिकी राजनीति में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां और उनका अति आत्मविश्वास इसी कबीर-दर्शन की याद दिला रहा है। ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई, इजरायल के साथ तनावपूर्ण संवाद और दुनिया के कई देशों पर टैरिफ का नया दबाव-इन सबने ट्रंप को अंतर्राष्ट्रीय ही नहीं, घरेलू राजनीति में भी घेरना शुरू कर दिया है।
ट्रंप सरकार को सबसे बड़ा झटका अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में लगा, जहां वॉर पावर्स रेजोल्यूशन २१५ के मुकाबले २०८ मतों से पारित हुआ। इस प्रस्ताव का उद्देश्य ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को कांग्रेस की मंजूरी के बिना जारी रखने से रोकना है। खास बात यह रही कि चार रिपब्लिकन सांसदों ने भी डेमोक्रेट्स का साथ दिया। यह केवल एक संसदीय मतदान नहीं, बल्कि ट्रंप की युद्ध नीति पर अपनी ही पार्टी के भीतर उठती असहमति का स्पष्ट संकेत है।
यह प्रस्ताव डेमोक्रेट नेता ग्रेगरी मीक्स द्वारा आगे बढ़ाया गया था। एडम स्मिथ, जिम हाइम्स और प्रमिला जयपाल जैसे नेताओं ने भी इसे संवैधानिक मर्यादा का प्रश्न बताया। उनका कहना है कि युद्ध की घोषणा या लंबी सैन्य कार्रवाई का अधिकार राष्ट्रपति की निजी इच्छा पर नहीं छोड़ा जा सकता। अमेरिकी संविधान कांग्रेस को युद्ध संबंधी निर्णयों में केंद्रीय भूमिका देता है। इस दृष्टि से यह प्रस्ताव ट्रंप के उस रवैये पर सीधी चोट है, जिसमें वे कांग्रेस को दरकिनार कर सैन्य पैâसले आगे बढ़ाते दिख रहे थे।
ईरान युद्ध को लेकर ट्रंप प्रशासन पर यह आरोप भी लग रहा है कि वह अपने घोषित लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाया। न तो ईरान के परमाणु कार्यक्रम को निर्णायक रूप से रोका जा सका और न ही क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित हो सकी। इसके उलट पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा, तेल और सुरक्षा को लेकर नई आशंकाएं पैदा हुईं और अमेरिकी जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ने लगा। पेट्रोल कीमतों और युद्ध खर्च को लेकर अमेरिकी नागरिकों में नाराजगी बढ़ रही है।
इसी बीच लेबनान में इजरायल सैन्य कार्रवाई को लेकर ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच तीखी फोन वार्ता की बात भी सामने आई। ट्रंप ने माना कि उन्होंने नेतन्याहू से कड़े शब्दों में बात की। यह घटना बताती है कि अमेरिका का सबसे करीबी पश्चिम एशियाई समीकरण भी अब तनाव से अछूता नहीं है।
तीसरा मोर्चा वैश्विक व्यापार का है। ट्रंप प्रशासन ने भारत, चीन, बांग्लादेश सहित ६० अर्थव्यवस्थाओं पर जबरन श्रम से जुड़े आरोपों के आधार पर १० से १२.५ प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा है। भारत जैसे साझेदार देश के लिए यह कदम व्यापारिक दबाव की राजनीति जैसा दिखता है।
युद्ध, कूटनीति और व्यापार-तीनों मोर्चों पर ट्रंप की आक्रामक शैली अब प्रतिरोध से टकरा रही है। अमेरिकी संसद का यह कदम साफ संकेत है कि लोकतंत्र में सत्ता कितनी भी मजबूत हो, वह संविधान और जनभावना से ऊपर नहीं हो सकती। अति अहंकार अंतत: अकेलापन लाता है और ट्रंप आज उसी राजनीतिक मोड़ पर खड़े दिखाई देते हैं।
