मुख्यपृष्ठस्तंभअस्पतालों में अग्निकांड... मरीजों की जान से खिलवाड़ और बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था

अस्पतालों में अग्निकांड… मरीजों की जान से खिलवाड़ और बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था

मनमोहन सिंह

मुजफ्फरपुर के प्रसाद हॉस्पिटल में मंगलवार देर रात लगी भीषण आग ने एक बार फिर देश की स्वास्थ्य सुविधाओं के खोखलेपन और सुरक्षा मानकों की अनदेखी को उजागर कर दिया है। इस हादसे में चार लोगों की मौत हो गई और बीस से अधिक लोग झुलस गए। लेकिन यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले पांच वर्षों में बिहार, उत्तर प्रदेश सहित पूरे हिंदुस्थान के अस्पतालों से इस तरह की दर्दनाक खबरें लगातार सामने आ रही हैं। हिंदुस्थान में वैसे ही लोग बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए तरसते हैं, ऐसे में अस्पतालों में होने वाले ये अग्निकांड मरीजों और उनके परिजनों के लिए जले पर नमक छिड़कने जैसे हैं।
कुछ दिल दहलाने वाली घटनाएं
पिछले पांच सालों में बिहार और उत्तर प्रदेश के दर्जनों छोटे-बड़े अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में आग लगने की घटनाएं दर्ज की गई हैं। उत्तर प्रदेश के लखनऊ में केजीएमयू, कानपुर के कार्डियोलॉजी अस्पताल, और हाल ही में झांसी के महारानी लक्ष्मी बाई मेडिकल कॉलेज के शिशु वार्ड में लगी आग ने पूरे देश को दहला दिया था, जहां कई नवजात शिशुओं की जान चली गई थी। वहीं बिहार में मुजफ्फरपुर के ताजा हादसे से पहले पटना के पीएमसीएच और कटिहार के सदर अस्पताल सहित कई निजी क्लीनिकों में शॉर्ट सर्किट के कारण आग लगने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
वजहें
इन सभी घटनाओं के पीछे की सबसे आम वजह शॉर्ट सर्किट रही है। अस्पतालों में क्षमता से अधिक बिजली उपकरणों का उपयोग, जैसे ओवरलोडेड एसी और वेंटिलेटर, और सालों पुराने जर्जर तारों का न बदला जाना इसका मुख्य कारण है। इसके अलावा, वेंटिलेशन की कमी के कारण धुआं तेजी से फैलता है, जिससे मरीजों का दम घुट जाता है।
लीपा-पोती बस!
हर बड़े हादसे के बाद सरकारें आनन-फानन में जांच कमेटी का गठन कर देती हैं। इन कमेटियों की रिपोर्ट में लगभग हमेशा कुछ बातें साफ तौर पर सामने आती हैं। जैसे अस्पतालों के पास फायर एनओसी यानी अनापत्ति प्रमाण पत्र का न होना या उसका समय पर रिन्यू न होना, अस्पतालों में लगे अग्निशमन यंत्रों का वर्किंग कंडीशन में न होना और वहां के स्टाफ को आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए कोई ट्रेनिंग या मॉक ड्रिल न दिया जाना।
हादसे के तुरंत बाद प्रशासनिक स्तर पर कुछ अधिकारियों का ट्रांसफर कर दिया जाता है, अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ एफआईआर दर्ज होती है और मुआवजे का ऐलान कर दिया जाता है। लेकिन कुछ समय बाद मामला ठंडा पड़ जाता है। ठोस संरचनात्मक सुधार या सख्त सेफ्टी ऑडिट के अभाव में स्थितियां जस की तस बनी रहती हैं।
आम हिंदुस्तानी पहले से ही बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं, बेड की कमी और महंगी दवाओं से जूझ रहा है। जब कोई मरीज अस्पताल जाता है, तो वह जीवन की उम्मीद लेकर जाता है, न कि मौत के जाल में फंसने। निजी अस्पतालों द्वारा सुरक्षा मानकों को ताक पर रखकर सिर्फ मुनाफा कमाना और सरकारी तंत्र की लापरवाही इस स्थिति के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है। अगर अब भी अस्पतालों का कड़ा फायर सेफ्टी ऑडिट नहीं किया गया और दोषियों को सख्त सजा नहीं दी गई, तो मुजफ्फरपुर जैसी चीखें देश के किसी न किसी कोने से हर रोज सुनाई देती रहेंगी।
यह समस्या सिर्फ दो राज्यों तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में हिंदुस्थान के कई प्रतिष्ठित और बड़े अस्पतालों में आग लगने की भयावह घटनाएं हुई हैं। गुजरात के भरूच और अहमदाबाद के निजी कोविड सेंटर्स में महामारी के दौरान दर्जनों मरीजों की जलकर मौत हो गई थी। महाराष्ट्र के भंडारा जिला अस्पताल के सिक न्यूबॉर्न केयर यूनिट में आग लगने से दस नवजात बच्चों की जान चली गई थी। मध्य प्रदेश के भोपाल में स्थित कमला नेहरू अस्पताल के चिल्ड्रेन वार्ड में भी ऐसा ही दर्दनाक हादसा हुआ था। यहां तक कि नई दिल्ली के एम्स जैसे बड़े संस्थान के कनवर्जेंस ब्लॉक में भी भीषण आग लग चुकी है।

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