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संपादकीय: बार-बार अग्नि तांडव 

देश जब महंगाई की भट्ठी में झुलस रहा है, ऐसे में आग की भयानक घटनाओं ने मासूम लोगों की जानें ले ली हैं। राजधानी दिल्ली और बिहार में आग के तांडव से हुई मौतें दहला देनेवाली हैं। दिल्ली के मालवीय नगर के ‘फ्लरिश स्टे’ होटल में लगी आग ने २१ लोगों की जान ले ली, तो वहीं बिहार के मुजफ्फरपुर में प्रसाद हॉस्पिटल के आईसीयू वार्ड में लगी आग से १० मरीजों की मौत हो गई। दोनों हादसों के लिए अब हमेशा की तरह तकनीकी कारण गिनाए जा रहे हैं। लेकिन इन तमाम तकनीकी वजहों के लिए आखिरकार वहां का लापरवाह प्रशासन और भ्रष्ट सिस्टम ही जिम्मेदार है, उसका क्या? दिल्ली के होटल में जान गंवानेवाले लोग मरीजों के रिश्तेदार थे, जबकि मुजफ्फरपुर के अस्पताल वाले हादसे में खुद मरीज ही मौत के मुंह में समा गए। हमारे देश में होटल-रेस्टोरेंट या अस्पतालों में आग लगने की घटनाएं बार-बार होती रहती हैं। इसके लिए कभी गैस सिलेंडर का फटना, तो कभी शॉर्ट-सर्किट जैसे बहाने बना दिए जाते हैं। यह सच है कि हादसे या दुर्घटनाएं अचानक होती हैं, लेकिन दिल्ली और बिहार के हादसों की वजह और उनका तरीका देखकर इसकी जिम्मेदारी से हुक्मरान और प्रशासनिक तंत्र पल्ला नहीं झाड़ सकते। इन दोनों हादसों के बाद जो खुलासे सामने आ रहे हैं, वे दिल्ली और बिहार की भाजपा सरकार के लापरवाह और ढीले-ढाले कामकाज को ही कटघरे में खड़ा करते हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता हों या बिहार के उप मुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी, दोनों ने हमेशा की तरह
गहन जांच
के आदेश दे दिए हैं। हादसे के दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की दहाड़ भी मारी है। दिल्ली के गृहमंत्री ने तो ‘बेड एंड ब्रेकफास्ट’ (बी एंड बी) योजना के नियमों का उल्लंघन करनेवाले दिल्ली के सभी बीएनबी को सील करने के निर्देश तक दे दिए हैं। लेकिन अब इससे क्या हासिल होगा? क्या बेमौत मारे गए लोगों की जानें वापस आ जाएंगी? पहले ‘बीएनबी’ योजना में भ्रष्टाचार की मलाई खानी है और जब कोई हादसा हो जाए तो धर-पकड़ करनी है, जांच का नाटक रचना है और जब मामला ठंडा पड़ जाए तो फिर से आम जनता को मरने के लिए भगवान भरोसे छोड़ देना है। दिल्ली का ‘फ्लरिश स्टे’ इसी ‘बीएनबी’ योजना के तहत चलाया जा रहा था। इस योजना में रजिस्टर्ड जगहों को ज्यादा से ज्यादा ८ कमरों और १६ बेड की ही इजाजत होती है। मगर इन नियमों को ताक पर रखकर राजधानी में धड़ल्ले से होटल-रेस्टोरेंट चलाए जा रहे हैं। ‘फ्लरिश स्टे’ होटल के मालिक के पास तो सिर्फ ६ कमरों का लाइसेंस था, फिर भी वह २५ कमरे चला रहा था। आज जो दिल्ली की भाजपा सरकार अचानक कुंभकर्णी नींद से जागी है, अगर वह पहले न सो रही होती तो कम से कम उस होटल की आग में झुलसकर मरनेवालों की तादाद इतनी ज्यादा न होती। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता कह रही हैं कि वे इस हादसे से बेहद दुखी हैं और हालात पर बारीक नजर रख रही हैं। अगर आपको
दुखी होना ही है
तो हादसे से ज्यादा २१ जानें लेने वाले अपने इस लचर और निकम्मे कामकाज पर होइए। अगर बारीक नजर पहले रखी होती तो ६ कमरों के लाइसेंस पर होटल मालिक २५ कमरों का धंधा कभी नहीं कर पाता। चार दिन पहले ही दक्षिण दिल्ली में जो इमारत गिरी और उसमें ६ लोग मारे गए, उनकी जान बच गई होती। उनमें से दो छात्रों के डॉक्टर बनने का सपना उस इमारत के मलबे के नीचे हमेशा के लिए दफन न हुआ होता। गिरी हुई इमारत के मालिक ने किराए के रूप में मिलनेवाले हर महीने के १० लाख रुपयों के लालच में दो और अवैध मंजिलें बनाने की जुर्रत न की होती। देश में ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ की दहाड़ मारनेवालों के अपने ही चिराग तले अंधेरा पसरा हुआ है। यही वजह है कि कहीं अवैध इमारतें भरभरा कर गिर रही हैं, कहीं होटल-रेस्टोरेंट तो कहीं अस्पतालों में आग लग रही है। ‘शॉर्ट-सर्किट’ का पुराना बहाना बनाकर ऐसे हादसों की जिम्मेदारी से मालिक, मैनेजर और सत्ताधारी लोग पल्ला झाड़कर किनारे हो जाते हैं। अब सरकार दिखावे की कार्रवाई करेगी और किसी न किसी को बलि का बकरा बना देगी। रेगुलर देख-रेख और मरम्मत में हुई नाकाबिले-माफी लापरवाही को दबा दिया जाएगा। हादसों में मारे गए लोगों के घरवालों को मुआवजे का ‘मरहम’ लगाया जाएगा और नेता साफ बच निकलेंगे। ‘देश बदल रहा है’ का ढिंढोरा पीटने वालों के राज में कुछ भी नहीं बदला है। भ्रष्ट और ढीला-ढाला कामकाज वैसे ही जारी है और उसकी आग में आम लोगों की जिंदगी कपूर की तरह जलकर खाक हो रही है। दिल्ली के होटल और बिहार के अस्पताल के इस अग्निकांड ने और उसमें गई ३१ जानों ने इसी कड़वे सच को एक बार फिर सरेआम लाकर खड़ा कर दिया है।

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