दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है भू-मंडल का ताप,
प्रदूषण से हो रहा है प्राणियों का बुरा हाल।
युद्ध के अस्त्र-शस्त्रों की बिक्री पर रोज तकरार,
सभी साधन झोंक रहे, प्रकृति कैसे माने हार।
नुक्कड़ नाटक, लेख, लंबे भाषण,
क्या होगा एक दिन का मंच सजा कर?
हम भारतवासी थे प्रकृति के उपासक,
पूजनीय थे वृक्ष, वन, सलिला और सागर।
दूब, झाड़, विटप, फल, फूलों से हमको था प्यार,
देवताओं संग पूजते थे उनके वाहन और आसन।
एक वृक्ष देता है पुण्य सहस्त्र कूपों का,
यह शिक्षा देता है सनातन।
बेल, आंवला, नीम, वट और पीपल,
गांव-गांव में दिखते थे अनगिनत।
समस्त वसुंधरा ढंकी थी भांति-भांति के वृक्षों से,
स्वार्थवश लील गए हम सारे कानन।
हरित धरा को हमने बना दिया मरुस्थल,
उन्नति, विकास के नाम पर बनती सड़कें, डैम, हवाई अड्डे।
कट जाते हैं लाखों वृक्ष एक बार में बेचारे,
एक पेड़ की आयु होती है दो-तीन अंकों में,
और आरी चलती है कुछ घंटों में।
वायु प्रदूषण से पक्षियों का हो रहा संहार,
वनों में वन्य जीवों पर भूख की लटकी तलवार।
सोचो, क्या कभी मांगती है धरा हमसे?
खाने, पहनने, रहने, चलने का यही आधार।
हमें तो जन्म से मरण तक काठ की ही दरकार,
मानव ने कर लिया धरती मां का चीर-हरण,
मरुस्थल, बंजर, सूखी भूमि का पैबंद लगाकर।
विश्व भर में जंगल वर्षों से जल रहे,
डीजल, पेट्रोल, रसायन, प्लास्टिक हम फूंक रहे।
परमाणु बमों, मिसाइलों, ड्रोनों की होड़ बढ़ा रहे,
दावानल को बुझाने के ढंग क्यों नहीं खोज रहे?
दोनों ध्रुवों के हिमखंड गल गए,
हिमनद भी विश्व-पटल से गायब हो गए।
नदियां, झीलें, झरने, पोखर, कूप सूख रहे,
धरा के जल की समाप्ति की नौबत आ गई।
विश्व के हितैषी वैज्ञानिक कुंभकरण की नींद सो रहे,
पर्यावरण के नाम पर बैठकों, मीटिंगों में धन और समय बर्बाद हो रहा।
अनिश्चित ऋतुओं से कृषकों का सामना हो रहा,
सूखा, कभी अतिवृष्टि और पाला पड़ रहा।
चेत जा मानव, अभी समय की चेतावनी है,
आज नहीं तो कल महाप्रलय तो आनी है।
बेला विरदी
