मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका: अन्न भंडारण पर बढ़ता कॉर्पोरेट पहरा!

पॉलिटिका: अन्न भंडारण पर बढ़ता कॉर्पोरेट पहरा!

के.पी. मलिक

-देश का अनाज, किसका राज?

-एफसीआई के ठेकों पर उठते सवाल और कॉर्पोरेट का मकड़जाल

-यह बहस केवल अडानी समूह तक सीमित नहीं है। मुद्दा इससे कहीं बड़ा है। प्रश्न यह है कि क्या भारत की सार्वजनिक संपत्तियों, बुनियादी ढांचे और आवश्यक सेवाओं का संचालन धीरे-धीरे कुछ बड़े निजी समूहों के हाथों में सिमटता जा रहा है?

भारत में खाद्य सुरक्षा केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ा हुआ विषय है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस), न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद और खाद्यान्न भंडारण की पूरी व्यवस्था देश की कृषि और खाद्य सुरक्षा की रीढ़ मानी जाती है। ऐसे में जब भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के आधुनिक साइलो निर्माण के बड़े ठेकों का अधिकांश हिस्सा दो कंपनियों के पास जाता दिखाई देता है, तो स्वाभाविक रूप से कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं। सरकार का तर्क है कि आधुनिक साइलो व्यवस्था से अनाज की बर्बादी कम होगी, भंडारण क्षमता बढ़ेगी और पूरी सप्लाई चेन अधिक कुशल बनेगी। सिद्धांत रूप से यह बात सही भी लगती है। भारत में वर्षों से खुले गोदामों और पारंपरिक भंडारण पद्धतियों के कारण अनाज के नुकसान की समस्या रही है। आधुनिक तकनीक का उपयोग निश्चित रूप से आवश्यक है। लेकिन सवाल तकनीक का नहीं, बल्कि उसके नियंत्रण का है।
यदि किसी राष्ट्रीय महत्व के क्षेत्र में अधिकांश ठेके कुछ गिनी-चुनी कंपनियों के पास चले जाएं, तो क्या यह स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का संकेत है या बाजार में बढ़ती एकाग्रता का?
यही वह प्रश्न है, जो एफसीआई के साइलो प्रोजेक्ट्स को लेकर उठ रहा है। कहा जा रहा है कि पहले ऐसी व्यवस्था थी, जिसमें एक ही कंपनी को अत्यधिक संख्या में परियोजनाएं मिलने से रोका जाता था, ताकि प्रतिस्पर्धा बनी रहे और किसी एक समूह का दबदबा न बने। लेकिन यदि बाद में इस प्रकार के प्रतिबंधों को हटाया गया और उसके परिणामस्वरूप अधिकांश ठेके सीमित कंपनियों के हाथों में केंद्रित हो गए, तो यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं रह जाता, बल्कि सार्वजनिक नीति की दिशा पर बहस का विषय बन जाता है।
सरकार और नीति निर्धारकों का दृष्टिकोण यह हो सकता है कि बाजार को खुला छोड़ने से दक्षता बढ़ती है और सबसे सक्षम कंपनी को काम मिलता है। लेकिन आलोचकों का तर्क बिल्कुल अलग है। उनका कहना है कि जब आर्थिक शक्ति और सरकारी ठेकों का संकेंद्रण एक ही दिशा में लगातार दिखाई देता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या नियम वास्तव में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के लिए बदले गए थे या फिर उनका लाभ कुछ विशेष कॉर्पोरेट समूहों को मिला। यह बहस केवल अडानी समूह तक सीमित नहीं है। मुद्दा इससे कहीं बड़ा है। प्रश्न यह है कि क्या भारत की सार्वजनिक संपत्तियों, बुनियादी ढांचे और आवश्यक सेवाओं का संचालन धीरे-धीरे कुछ बड़े निजी समूहों के हाथों में सिमटता जा रहा है? बंदरगाह, हवाई अड्डे, ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स और अब खाद्यान्न भंडारण जैसे क्षेत्रों में लगातार बढ़ती कॉर्पोरेट उपस्थिति इसी चिंता को जन्म देती है।
खाद्य सुरक्षा या कॉर्पोरेट नियंत्रण का विस्तार?
खाद्यान्न भंडारण कोई साधारण व्यापार नहीं है। यह देश की खाद्य सुरक्षा का हिस्सा है। जिस संस्था के पास भंडारण, परिवहन और वितरण के महत्वपूर्ण बिंदुओं पर नियंत्रण होगा, उसकी आर्थिक और रणनीतिक शक्ति भी उतनी ही बढ़ेगी। ऐसे में यह अपेक्षा की जाती है कि सरकार केवल दक्षता ही नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा, पारदर्शिता और शक्ति के संतुलन को भी ध्यान में रखे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, आलोचक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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