राजन पारकर
-‘दूल्हे-दुल्हन से ज्यादा चर्चा बारात की!’
राजनीति में कुछ सीटें ऐसी होती हैं, जो खाली होते ही नेताओं की महत्वाकांक्षाएं ऐसे जाग उठती हैं जैसे बरसात की पहली फुहार पड़ते ही मेंढकों का सम्मेलन शुरू हो जाता है। राज्यसभा की एक सीट क्या खाली हुई, राजनीतिक गलियारों में भविष्यवक्ताओं, विश्लेषकों और अफवाह विशेषज्ञों की मानो चांदी हो गई। कौन किसके बंगले पर गया, किसने किससे मुलाकात की, किसने किसके कान में क्या फुसफुसाया, यही राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया। ऐसा लगने लगा कि देश की सबसे बड़ी समस्या महंगाई, बेरोजगारी या किसानों की नहीं, बल्कि यह है कि राज्यसभा की सीट पर कौन विराजमान होगा। आजकल राजनीति में काम करने से पहले चर्चा में आना जरूरी हो गया है। चर्चा हो गई तो समझिए आधी मंजिल तय हो गई। जनता अपने सवाल लेकर दरवाजे पर खड़ी रहती है और नेता टिकट लेकर सत्ता के दरबार में लाइन लगाते रहते हैं। राजनीतिक मुलाकातों का यह दौर देखकर लगता है कि राज्यसभा अब संसद का सदन कम और कोई रियलिटी शो ज्यादा बन गई है, जहां अंतिम एपिसोड तक दर्शकों को सस्पेंस में रखा जाता है और अंत में विजेता की घोषणा कर दी जाती है।
-‘चौकीदारों की गहरी नींद!’
देश में जब कोई नया घोटाला सामने आता है तो जनता सबसे पहले यह नहीं पूछती कि घोटाला कितना बड़ा है, बल्कि यह पूछती है कि आखिर इतने दिनों तक किसी को दिखाई क्यों नहीं दिया? लाखों-करोड़ों के आंकड़े अब लोगों को चौंकाते नहीं हैं। आम आदमी बिजली का बिल देखकर घबरा जाता है, लेकिन जब हजारों करोड़ के घोटालों की खबर सुनता है तो चाय का एक और घूंट लेकर अखबार का अगला पन्ना पलट देता है। क्योंकि उसे पता है कि अब घोटाले भी मौसम की तरह नियमित हो चुके हैं। जनता अपनी जीवनभर की कमाई संस्थाओं पर भरोसा करके सौंपती है। लेकिन जब उन्हीं पैसों के आसपास सवाल उठने लगते हैं तो लोगों को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या पहरेदार सो रहे थे, सोने का नाटक कर रहे थे या फिर किसी और ही सपने में खोए हुए थे। हर घोटाले के बाद जांच होती है, समितियां बनती हैं, रिपोर्ट आती हैं, बयान दिए जाते हैं और दोषियों को पकड़ने के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। लेकिन अंत में जनता को यही समझ नहीं आता कि गलती किसकी थी और जिम्मेदारी आखिर किसकी है। ऐसा लगता है कि हमारे यहां जवाबदेही से ज्यादा मजबूत अगर कोई चीज है तो वह है जिम्मेदारी को एक-दूसरे के सिर पर डालने की कला।
-‘अभिनय कम, आरोप ज्यादा; मनोरंजन उद्योग का नया सुपरहिट धारावाहिक!’
एक समय था जब कलाकार अपने अभिनय के लिए मशहूर होते थे। आज का दौर ऐसा है कि विवादों की लोकप्रियता कई बार अभिनय से भी ज्यादा हो जाती है। एक ने बयान दिया, दूसरी ने प्रतिक्रिया दी, फिर वीडियो आया, फिर पोस्ट आई, फिर स्टोरी आई और उसके बाद सोशल मीडिया की अदालत लग गई। लाखों जज बिना किसी नियुक्ति पत्र के पैâसला सुनाने के लिए तैयार बैठे रहते हैं। मनोरंजन उद्योग में अब फिल्मों और धारावाहिकों से ज्यादा दिलचस्पी कलाकारों की आपसी लड़ाइयों में दिखाई देने लगी है। दर्शकों को लगता है कि वे कोई सीरियल देख रहे हैं, असल में वे इंस्टाग्राम और यूट्यूब के एपिसोड देख रहे होते हैं। आज के दौर में प्रसिद्धि का सबसे सस्ता और सबसे तेज माध्यम विवाद बन चुका है। फिल्म चले या न चले, शो हिट हो या फ्लॉप हो, लेकिन सोशल मीडिया पर ट्रेंड होना अनिवार्य हो गया है। कलाकार अभिनय से कम और स्पष्टीकरण देने में ज्यादा व्यस्त दिखाई देते हैं। मनोरंजन उद्योग का यह नया दौर दर्शकों को हंसाने से ज्यादा हैरान करने में सफल हो रहा है। राजनीति में कुर्सी की दौड़, अर्थव्यवस्था में घोटालों का शोर और मनोरंजन जगत में आरोपों का युद्ध-तीनों खबरें भले अलग दिखाई देती हों, लेकिन इनका सार एक ही है: शोर बहुत है, जवाबदेही बहुत कम है।
