मुख्यपृष्ठस्तंभतरकश : अब मोहन भागवत क्या करेंगे?

तरकश : अब मोहन भागवत क्या करेंगे?

 धनुर्धर

आखिर संघ प्रमुख मोहन भागवत जी ने वह बात कह दी, जिसका विरोधियों को बेसब्री से इंतजार था। उन्होंने बताया कि भारत अभी विश्वगुरु नहीं है। उसमें संभावनाएं तो पूरी हैं विश्वगुरु बनने की, लेकिन उसकी तैयारियां अधूरी हैं। लिहाजा वह विश्वगुरु नहीं बन पा रहा। विरोधी स्वाभाविक ही इस रहस्योद्घाटन पर उछल पड़े। वैसे सच पूछिए तो इसमें उछल पड़ने वाली कोई बात नहीं है। यह गंभीरता से चिंतन-मनन करनेवाली बात है।
वो वाला वर्तमान
यह तो हम सुनते आए हैं कि भारत अतीत में विश्वगुरु रहा है और भविष्य में भी विश्वगुरु ही होगा। बस वर्तमान में मामला थोड़ा गड़बड़ाया हुआ था, लेकिन वह वर्तमान ये वाला वर्तमान नहीं था। वह दस-बारह साल पहले का वर्तमान था, जब या तो कांग्रेस राज था या कांग्रेस की अगुआई स्वीकार कर चुके दलों का शासन था। बीच में कुछ समय के लिए बीजेपी की सरकार रही भी तो वह असल में बीजेपी की अगुआई स्वीकार कर चुके दलों की सरकार थी। अब जिन लोगों ने आपकी अगुआई स्वीकार कर ली हो, उन्हें भी आप एक सीमा से ज्यादा बेवकूफ नहीं बना सकते, न ही एक हद से ज्यादा दबा सकते हैं। यह खतरा बना रहता है कि कहीं वे आंकी अगुआई मानने से इनकार न कर बैठें।
कोई कन्फ्यूजन नहीं
हर कोई मोदी जी जैसा कुशल तो होता नहीं कि विरोधियों को भी साथ ले और सहयोगियों को भी साधे रहे। सो, पहले की सरकारों वाला वर्तमान ऐसा नहीं था, जिसमें भारत विश्वगुरु का अपना पुराना रुतबा हासिल कर सके। इस बिंदु तक कोई कन्फ्यूजन, कोई विवाद नहीं है। मसला इसके बाद शुरू होता है, जब २०१४ में भारत को असली वाली आजादी मिली और मोदी जी ने कमान संभाल ली। फिर तो इसमें कोई संदेह किसी को नहीं रहा कि भारत विश्वगुरु बन चुका है। जिसके मन में संदेह था भी, वह उसे व्यक्त करने की हिम्मत नहीं कर सकता था।
दुनिया में बजता डंका
इसके बाद का अगला पूरा दशक मोदी जी की छत्रछाया में यह देश विश्वगुरु बना रहा। समय-समय पर हमें बताया जाता रहा कि वैâसे विश्वगुरु के रूप में पूरी दुनिया में भारत का डंका बज रहा है, वैâसे हमारे मोदी जी चीन-अमेरिका समेत पूरी दुनिया के नेताओं को आंख दिखाते रहते हैं और वैâसे यह पूरी दुनिया उनकी आंख के इशारे पर नाचती रहती है। कहीं युद्ध शुरू भी हो जाए उनसे बिना पूछे और वह उसे बंद न भी करवा सकें तो अपने इशारे पर थोड़ी देर के लिए पॉज तो करवा ही सकते हैं, अगर चाह लें।
ऐसी दोस्ती
लेकिन कहते हैं न कि दुश्मन जो न कर सके, वह नुकसान दोस्त करवा देता है। सो, मोदी जी को भी एक दोस्ती भारी पड़ गई। अमेरिका में बैठे डियर प्रâेंड ने दुनियाभर में बजते उनके डंके की लंका निकाल दी। हालांकि, उस अमेरिकी दोस्त का उन पर प्यार कम नहीं हुआ कभी भी, इनकी महानता में उसका विश्वास भी नहीं डिगा कभी। हर दूसरे दिन वह घोषणा करता रहता है कि माई डियर प्रâेंड मोदी इज ग्रेट।
सच बकने की आदत
दिक्कत यह है कि उसे सच बकने की बुरी आदत भी है। जो भी उसे सच लगता है, बक देता है। कह दिया कि भारत-पाकिस्तान वॉर मैंने रुकवाया। यह भी नहीं सोचा कि वॉर रुकवाने का ठेका तो मोदी जी के पास है। यहां तक तो फिर भी चल जाता। लेकिन वह यह भी कह चुका है कि मैं अपने दोस्त का करियर तबाह नहीं करना चाहता। हालांकि, जब चाहूं कर सकता हूं।
सबसे भली चुप
खैर, मोदी जी में इतनी कुशलता है कि इन सब बाधाओं को पार कर लें। जहां बोलने को कुछ नहीं होता, वहां वे चुप्पी मारकर भी काम चला लेते हैं। पर संघ प्रमुख के ताजा बयान ने मुसीबत बढ़ा दी है। इस बयान की कोई जरूरत नहीं थी वैसे। अगर उन्हें लग भी रहा था कि भारत अभी विश्वगुरु नहीं है तो चुप रह सकते थे। औरों को नहीं तो कम से कम मोदी जी को देखकर ही चुप रहने की कला सीख लेते। जहां जरूरत न हो, वहां भर-भरकर बोलिए, लेकिन जहां जरूरत हो, वहां जबान सिल लीजिए। राजनीति में सरवाइव करने का यह सलीका संघ प्रमुख सीख लेते तो आज बहुतों के सिर से मुसीबत अपने आप टल जाती।
उठते सवाल
मगर अब तो बोल दिया है तो सवाल भी उठ रहे हैं कि भारत अगर आज विश्व गुरु नहीं है तो यह उस सिंहासन से नीचे कब उतरा। क्या २०१४ में सिंहासनारूढ़ किए जाने के तुरंत बाद उसे उतार भी दिया गया था या यह काम दो-चार साल बाद हुआ या फिर २०२४ के लोकसभा चुनावों के बाद? और कारण क्या रहा इसका? वह रहस्यमय फाइल या ज्ञानेश जी का चुनाव कराने का अपना अलग अंदाज या विरोधियों को खा जाने की बीजेपी की बिगड़ती आदत या…।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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