-एटीएम से पैसे निकालना हो सकता है मुश्किल
-लोगों को नहीं मिल रही नकदी…आरबीआई तक पहुंचा मामला
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
नोटबंदी के बाद क्या देश अब `कैशबंदी’ की तरफ बढ़ रहा है? क्या एटीएम से पैसा निकालना जल्द ही किसी चुनौती से कम नहीं रहेगा? यह सवाल इसलिए खड़े हो रहे हैं क्योंकि हाल ही में देश के कई हिस्सों से नकदी की किल्लत की खबरें सामने आ रही हैं। एटीएम खाली पड़े हैं। लोगों को जरूरत के वक्त पैसा नहीं मिल रहा और मामला अब आरबीआई तक पहुंच चुका है। सवाल ये है कि जब बैंकिंग सिस्टम डिजिटल हो रहा है, तब आखिर वैâश का संकट क्यों गहरा रहा है? क्या आम आदमी को फिर नकदी के लिए लंबी कतारों का सामना करना पड़ेगा?
गौरतलब है कि देश के कई राज्यों में एटीएम में नकदी की कमी की खबरें सामने आ रही हैं। एटीएम उद्योग संगठन सीएटीएमआई ने भारतीय बैंक संघ (आईबीए) और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को इस समस्या से अवगत कराया है। संगठन का कहना है कि कई एटीएम में पर्याप्त नकदी नहीं पहुंच रही है, जिससे सेवाएं प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है। खासकर ग्रामीण और उपनगरीय क्षेत्रों में लोगों को पैसे निकालने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे किसानों और छोटे कारोबारियों की चिंता बढ़ गई है। महाराष्ट्र के कुछ जिलों में भी वैâश न मिलने की समस्या सामने आई है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, मार्च और अप्रैल के दौरान एटीएम नेटवर्क को कुल ९४,००० करोड़ रुपए नकदी की जरूरत थी। हालांकि, मार्च में केवल ६१,००० करोड़ रुपए और अप्रैल में ५४,००० करोड़ रुपए ही उपलब्ध हो सके। नकदी की आपूर्ति और मांग के बीच बढ़े इस अंतर के कारण कई क्षेत्रों में एटीएम प्रभावित हुए हैं।
नकदी की मार से जूझ रहा ग्रामीण भारत
नकदी की कमी का सबसे अधिक असर ग्रामीण इलाकों में देखा जा रहा है। खरीफ सीजन की बुवाई शुरू होने से पहले किसानों को नकदी की जरूरत होती है, लेकिन कई जगहों पर उन्हें एटीएम से पैसा नहीं मिल पा रहा है। इससे खेती से जुड़े कामकाज और स्थानीय कारोबार प्रभावित हो रहे हैं।
असली महंगाई तो अब आएगी!
आरबीआई ने दिए डरावने संकेत
भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष २०२६-२७ के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर का अनुमान बढ़ाकर ५.१ प्रतिशत कर दिया है। इससे पहले केंद्रीय बैंक ने महंगाई ४.६ प्रतिशत रहने का अनुमान व्यक्त किया था। इस संशोधन को अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। क्योंकि यह दर्शाता है कि मूल्य वृद्धि का दबाव पहले के अनुमान से अधिक रहने की संभावना है।
