प्रो. दयानंद तिवारी
उर्दू गजल की दुनिया में डॉ. बशीर बद्र का नाम केवल एक शायर के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी आवाज के रूप में याद किया जाएगा, जिसने गजल को आम आदमी के दिल की भाषा बना दिया। अभी हाल ही में उनके निधन से साहित्य-जगत में गहरी शोक-लहर फैल गई। यह केवल एक शायर का जाना नहीं, बल्कि उस दौर का मौन हो जाना है जिसमें मोहब्बत, रिश्ते, तन्हाई, यादें और मनुष्यता बहुत सादगी से बोलती थीं।
बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे कठिन भाषा में नहीं, दिल की भाषा में बात करते थे। उनकी गजलों में उर्दू की नफासत, हिंदी की आत्मीयता और हिंदुस्थानी जीवन की सच्चाई एक साथ दिखाई देती है। वे प्रेम के शायर थे, लेकिन उनका प्रेम केवल रूमानी नहीं था; उसमें जीवन का अनुभव, रिश्तों की टूटन, स्मृति की पीड़ा, सामाजिक व्यवहार और मनुष्य की करुणा भी शामिल थी। बशीर बद्र ने गजल को महफिलों और किताबों से निकालकर आम जनमानस के भीतर स्थापित किया। उनकी पंक्तियां केवल पढ़ी नहीं जातीं, बल्कि जीवन की परिस्थितियों में याद की जाती हैं। जब संबंध टूटते हैं, जब यादें सताती हैं, जब मनुष्य अकेला पड़ता है, जब समाज में संवाद की जगह कटुता बढ़ती है, तब बशीर बद्र की गजलें किसी सहारे की तरह हमारे साथ खड़ी दिखाई देती हैं।
उनकी पांच प्रसिद्ध गजलों की यादगार पंक्तियां
बशीर बद्र की अनेक गजलें लोगों की जुबान पर चढ़ चुकी हैं। उनकी कुछ प्रसिद्ध गजलों की पंक्तियां आज भी स्मृति में उजाले की तरह जीवित हैं। उदाहरण के रूप में उनकी पांच प्रसिद्ध गजलों की ये पंक्तियां विशेष रूप से याद की जाती हैं-
१. यादों और उजालों की गजल
‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो…’
‘न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए…’
इन पंक्तियों में बशीर बद्र ने स्मृतियों को जीवन की अंतिम रोशनी बना दिया है। वे कहते हैं कि मनुष्य का जीवन अनिश्चित है, इसलिए यादों का उजाला साथ रहना चाहिए।
२. रिश्तों और दुश्मनी की मर्यादा वाली गजल
‘दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे…’
‘जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों…’
इस गजल में वे मनुष्य को संवाद की संस्कृति सिखाते हैं। विरोध हो, मतभेद हो, संघर्ष हो, फिर भी संबंधों का अंतिम पुल नहीं टूटना चाहिए।
३. समाज और व्यवहार की सच्चाई वाली गजल
‘कोई हाथ भी न मिलाएगा…’
‘जो गले मिलोगे तपाक से…’
इस गजल में समाज की बाहरी चमक और भीतर की दूरी दिखाई देती है। बशीर बद्र बताते हैं कि मनुष्य का सम्मान अक्सर परिस्थिति के साथ बदलता है।
४. प्रेम और नाजुक संवेदना की गजल
‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में…’
‘तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में…’
इन पंक्तियों में घर केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है, बल्कि मनुष्य के सपनों, परिश्रम और भावनाओं का संसार है। बशीर बद्र यहां विनाश के सामने निर्माण की पीड़ा को रख देते हैं।
५. जीवन और आत्मीयता की गजल
‘कभी यूं भी आ मेरी आंख में…’
‘कि मेरी नजर को खबर न हो…’
इस गजल में प्रेम की बहुत कोमल अनुभूति दिखाई देती है। यहां प्रेम शोर नहीं करता, वह चुपचाप आत्मा में उतरता है। यही बशीर बद्र की रूमानी संवेदना की सुंदरता है।
इन पांचों गजलों से स्पष्ट होता है कि बशीर बद्र केवल प्रेम के शायर नहीं थे, वे जीवन के शायर थे। उनकी शायरी में स्मृति भी है, संघर्ष भी है, घर भी है, समाज भी है, प्रेम भी है और मनुष्यता भी है।
बशीर बद्र का जन्म १५ फरवरी १९३५ को उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनका पूरा नाम सैयद मोहम्मद बशीर था। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की और अध्यापन से भी जुड़े। वे केवल मंचीय लोकप्रियता के शायर नहीं थे, बल्कि गंभीर साहित्यिक अध्ययन और आलोचना से भी जुड़े हुए विद्वान थे। उन्हें पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार जैसे प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए। उनका गजल-संग्रह ‘आस’ विशेष रूप से चर्चित रहा।
बशीर बद्र की गजलों की भाषा जितनी सरल है, उसका प्रभाव उतना ही गहरा है। वे बड़े-बड़े दर्शन को छोटे-छोटे शब्दों में कह देते हैं। यही उनकी सबसे बड़ी काव्य-प्रतिभा है। उनकी शायरी में बनावट नहीं, आत्मीयता है। वे प्रेम की बात करते हैं तो उसमें शालीनता होती है; वे दुख की बात करते हैं तो उसमें करुणा होती है; वे समाज की बात करते हैं तो उसमें अनुभव की सच्चाई होती है।
उनकी गजलों में शहर भी है और घर भी, रिश्ते भी हैं और अकेलापन भी, यादें भी हैं और भविष्य का डर भी। वे छोटी-छोटी चीजों-धूप, बारिश, खिड़की, दरवाजा, रास्ता, शाम और उजाला के माध्यम से जीवन की बड़ी बातें कह देते हैं। यही कारण है कि उनकी गजलें केवल साहित्यिक मंचों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि जन-स्मृति का हिस्सा बन गईं।
१९८७ के मेरठ दंगों ने बशीर बद्र के जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। उस त्रासदी में उनके घर और साहित्यिक सामग्री को भारी क्षति पहुंची। इसके बाद वे भोपाल आकर बस गए। इतनी बड़ी व्यक्तिगत पीड़ा के बाद भी उनकी शायरी में मनुष्यता का विश्वास समाप्त नहीं हुआ। वे नफरत के शायर नहीं बने; वे स्मृति, प्रेम्ा और संवाद के शायर बने रहे। यही उनकी आत्मिक शक्ति थी।
बशीर बद्र की शायरी हमें यह सिखाती है कि टूटकर भी मनुष्य को मनुष्य बने रहना चाहिए। रिश्तों में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन संवाद का रास्ता बंद नहीं होना चाहिए। प्रेम में दूरी आ सकती है, लेकिन गरिमा नहीं जानी चाहिए। जीवन में अंधेरा आ सकता है, लेकिन यादों के उजाले बचाए रखने चाहिए।
आज जब हम उन्हें स्मृति-शेष के रूप में याद करते हैं, तो यह अनुभव होता है कि बड़े शायर कभी सचमुच नहीं जाते। उनका शरीर भले शांत हो जाए, लेकिन उनकी आवाज लोगों के भीतर गूंजती रहती है। बशीर बद्र की गजलें आज भी प्रेम करने वालों, बिछड़ने वालों, अकेले पड़ जाने वालों और संवेदनशील मनुष्यों के लिए सहारा हैं।
उन्होंने गजल को दरबार की भाषा नहीं रहने दिया, उसे दिल की भाषा बना दिया। उन्होंने बताया कि सादगी सबसे कठिन कला है और सरल शब्दों में गहरी बात कह देना ही बड़े शायर की पहचान है। उनकी शायरी में प्रेम है, पीड़ा है, जीवन है, समाज है और सबसे बढ़कर मनुष्यता है।
स्मृति शेष बशीर बद्र को विनम्र श्रद्धांजलि। उनकी गजलों के उजाले आने वाली पीढ़ियों के साथ भी बने रहेंगे।
