मुख्यपृष्ठस्तंभउत्तर प्रदेश के आउटसोर्सिंग का कड़वा सच

उत्तर प्रदेश के आउटसोर्सिंग का कड़वा सच

एम एम एस

एंबुलेंस ड्राइवरों की गुलामी का नया कलेवर

कागजी वेतन और वसूली का खेल

ड्राइवरों को लिखा-पढ़ी में सरकार द्वारा तय न्यूनतम वेतन ही दिया जाता है। उनके बैंक खातों में १२,००० से १७,००० रुपए ट्रांसफर भी होते हैं, ताकि कानून की नजर में सब ठीक रहे। लेकिन असलियत में ठेकेदार डरा-धमकाकर और तरह-तरह की तरकीबें अपनाकर उनसे ४,००० से ५,००० रुपए वापस वसूल लेते हैं। जो ड्राइवर पैसा देने से मना करता है, उसे तुरंत बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।
उत्तर प्रदेश के एक इलाके में शाम सड़क किनारे करीब दो सौ मीटर तक नौजवानों की भारी भीड़ जमा थी। हाथों में कागज लिए, फुटपाथ और स्टेशनों पर रात गुजारकर आए ये युवा कोई परीक्षा देने नहीं आए थे। ये उत्तर प्रदेश की १०८ एंबुलेंस सेवा के वे ड्राइवर थे, जिन्हें नया ठेका आते ही अचानक नौकरी से निकाल दिया गया था। अब वे `Eश्Rघ् ग्रीन हेल्थ सर्विसेज’ के एचआर महोदय के नाम दोबारा बहाली और तबादले के लिए मिन्नतें करते हुए प्रार्थना पत्र लिख रहे थे।
यह दृश्य देश के सर्विस सेक्टर में पैâले आउटसोर्सिंग और ठेका प्रथा की उस विडंबना को बयां करता है, जहां मजदूर सिर्फ एक इस्तेमाल होने वाली वस्तु बनकर रह गया है। कानूनन जो मजदूर किसी संस्थान में निरंतर और स्थायी प्रकृति का काम करते हैं, उन्हें ठेके पर नहीं रखा जा सकता। ऐसे पदों पर नियमित (परमानेंट) नियुक्तियां होनी चाहिए, लेकिन हकीकत में ठेका प्रथा अब अपवाद नहीं बल्कि नियम बन चुकी है।
पीपीपी मॉडल पर चलने वाली इन आपातकालीन सेवाओं में ठेका बदलने पर पुराने लोगों को निकाल देना एक आम बात है, क्योंकि इसमें सरकार का कानूनन कोई सीधा हस्तक्षेप नहीं होता। इस व्यवस्था के भीतर मजदूरों के शोषण का एक ऐसा चक्र काम कर रहा है, जो बेहद परेशान करने वाला है।
नौकरी के नाम पर बड़ी उगाही
एक ड्राइवर को निकालकर उसकी जगह दूसरा ड्राइवर रखना ठेकेदारों के लिए मुनाफे का सौदा है। नई भर्तियों के लिए एक-एक मजदूर से ५०,००० रुपये (लगभग तीन महीने की तनख्वाह) तक की रिश्वत मांगी जा रही है।
प्रतिष्ठित संस्थाओं का दोहरा चेहरा
`Eश्Rघ् ग्रीन हेल्थ सर्विसेज’ भारत की सबसे बड़ी गैर-लाभकारी संस्था एनजीओ है। इतने बड़े नाम और गैर-लाभकारी उद्देश्य के बावजूद इस व्यवस्था के जमीनी स्तर पर ड्राइवरों से अवैध वसूली, छुट्टी न मिलना और १२ घंटे की जगह २४-२४ घंटे की ड्यूटी कराना एक आम बात बन चुकी है।
शोषण का आर्थिक गणित और व्यवस्था की विफलता
इस पूरे खेल के पीछे एक गहरा आर्थिक गणित काम कर रहा है। सरकारी नियमों के तहत सर्विस सेक्टर की कंपनियां उाश् पोर्टल पर मात्र ३.८५ज्ञ् के न्यूनतम सर्विस चार्ज पर काम का ठेका लेती हैं। इसमें ३ज्ञ् कंपनी का लाभ होता है और ०.८५ज्ञ् पोर्टल का ट्रांजैक्शन शुल्क।
आज के समय में जब बैंकों में बिना कुछ किए पैसा जमा रखने पर भी २.५ज्ञ् का ब्याज मिल जाता है, तब कोई भी कंपनी तमाम स्टाफ, दफ्तर और व्यवस्था बनाए रखने का खर्च उठाकर इतने कम मुनाफे में काम नहीं कर सकती। इससे कहीं अधिक लाभ तो वे बाजार से ब्याज पर पैसा उठाकर कमा सकती हैं।
यही कारण है कि कंपनियां कानूनी तौर पर दिखाने के लिए तो कम मार्जिन पर ठेका ले लेती हैं, लेकिन अपना असल मुनाफा मजदूरों की जेब काटकर और उनका शोषण करके निकालती हैं। स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि यह सर्विस सेक्टर अब रसूखदार लोगों के लिए काले धन को सफेद करने का एक आसान जरिया बनता जा रहा है।
आज देश की अधिकांश जरूरी सेवाएं आउटसोर्सिंग के भरोसे चल रही हैं। एंबुलेंस चलाने वाले इन ड्राइवरों की बेबसी यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर नियम ऐसे क्यों नहीं बनते जिनका जमीनी स्तर पर कड़ाई से अनुपालन हो सके? जब तक सरकार इन ठेकेदारों की जवाबदेही तय नहीं करेगी और कानून का राज स्थापित नहीं होगा, तब तक कागजों पर पूरा वेतन मिलता रहेगा और सड़कों पर मजदूर यूं ही फुटपाथ पर बैठकर अपनी बहाली की भीख मांगते रहेंगे।

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