मुख्यपृष्ठस्तंभउत्तराखंड में फिर गूंजी आवाज, नशा नहीं-रोजगार दो!

उत्तराखंड में फिर गूंजी आवाज, नशा नहीं-रोजगार दो!

रमन मिश्र

उत्तराखंड में देवप्रयाग के मुरारी नगर में शराब की दुकान खोलने के विरोध में स्थानीय महिलाओं का प्रदर्शन और उन्हें पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने का मामला सोशल मीडिया पर काफी चर्चा में है।
देवप्रयाग एक प्रसिद्ध पौराणिक और धार्मिक तीर्थ स्थल है, जहां अलकनंदा और भागीरथी नदियों का पवित्र संगम होता है और यहीं से ‘गंगा’ नदी का उद्गम माना जाता है। स्थानीय निवासियों और विशेषकर महिला संगठनों का कहना है कि ऐसे पवित्र धार्मिक क्षेत्र में शराब की दुकान (ठेका) खोलना जनभावनाओं और धार्मिक आस्था के साथ खिलवाड़ है।
मुरारी नगर (भुइट गांव क्षेत्र) में शराब के ठेके को हटाने की मांग को लेकर महिलाओं ने जिला पंचायत सदस्य और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की अगुवाई में प्रदर्शन शुरू किया और अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गईं। प्रदर्शनकारी महिलाएं दुकान को वहां से पूरी तरह हटाने या उखाड़ फेंकने की मांग पर अड़ी थीं। पुलिस ने आंदोलन की अगुवाई कर रहे सीताराम रनाकोटी और कई आंदोलनकारी महिलाओं (जिनमें कुछ बुजुर्ग महिलाएं भी शामिल थीं) को जबरन हटाकर हिरासत में ले लिया।
देवप्रयाग में देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं। ऐसे में रिहायशी और धार्मिक क्षेत्र में ठेका खुलने से सामाजिक माहौल खराब होने और महिलाओं व बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई जा रही है। स्थानीय निवासियों ने पुलिसिया कार्रवाई की तीखी निंदा की है। उनका आरोप है कि सरकार जनभावनाओं को दबाने और शराब माफियाओं को संरक्षण देने के लिए पुलिस के जरिए महिलाओं को घसीटकर हटा रही है। फिलहाल, क्षेत्र में तनाव की स्थिति बनी हुई है और स्थानीय लोग इस दुकान को रिहायशी और धार्मिक दायरे से बाहर स्थानांतरित करने की मांग पर अड़े हुए हैं। उत्तराखंड में शराब के ठेकों का विरोध और पूर्ण शराबबंदी की मांग एक बेहद संवेदनशील, पुराना और गहरा सामाजिक-आर्थिक मुद्दा है। जब भी देवप्रयाग जैसी पवित्र देवभूमि या शांत पहाड़ी गांवों में मातृशक्ति (महिलाओं) पर पुलिसिया कार्रवाई के वीडियो सामने आते हैं, तो जनता का आक्रोशित होना और सरकार के रवैये पर सवाल उठाना स्वाभाविक है।
उत्तराखंड के निर्माण और अस्मिता की लड़ाई में महिलाओं (मातृशक्ति) की भूमिका सबसे अग्रणी रही है। आज भी जब पहाड़ों में शराब विरोधी आंदोलन होते हैं, तो महिलाएं ही सबसे आगे खड़ी होती हैं। ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों में शराबखोरी का सबसे सीधा और क्रूर असर महिलाओं पर पड़ता है। घरेलू हिंसा, पुरुषों का स्वास्थ्य खराब होना, और कमाऊ सदस्यों की अकाल मृत्यु के कारण पूरे के पूरे परिवार आर्थिक तबाही के कगार पर पहुंच जाते हैं।
देवप्रयाग जैसे पौराणिक और धार्मिक स्थलों, जहां गंगा का उद्गम (अलकनंदा-भागीरथी संगम) होता है, वहां शराब की दुकानें खोलने को स्थानीय लोग अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था पर चोट मानते हैं।
रिहायशी इलाकों, स्कूलों या मुख्य रास्तों के पास ठेके खुलने से महिलाओं और बच्चियों की आवाजाही असुरक्षित हो जाती है, जो कि इस हालिया आंदोलन का भी एक बड़ा कारण रहा है।
उत्तराखंड में पूर्ण शराबबंदी की मांग नई नहीं है; ‘नशा नहीं, रोजगार दो’ का नारा उत्तराखंड राज्य आंदोलन के समय से ही गूंजता रहा है। इस संवेदनशील मुद्दे पर स्थानीय जनता, विशेषकर महिलाओं की सहमति और सुरक्षा को सर्वोपरि रखा जाए, न कि पुलिसिया हिंसा और क्रूरता के जरिए जनभावनाओं को दबाया गया।
मातृशक्ति बनाम शराब नीति
देवप्रयाग में शराब के ठेके के विरोध में महिलाओं का आंदोलन फिर राज्य आंदोलन की याद दिला गया। ‘नशा नहीं, रोजगार दो’ के नारों के बीच महिलाओं को हिरासत में लेने से जनाक्रोश बढ़ गया है। सवाल उठ रहा है कि आस्था और जनभावनाओं से जुड़े मुद्दों पर सरकार संवाद क्यों नहीं कर रही?
देवभूमि में ठेका, जनता में रोष
गंगा उद्गम स्थल माने जाने वाले देवप्रयाग में शराब की दुकान खोलने के फैसले ने स्थानीय लोगों को आंदोलन के लिए मजबूर कर दिया। महिलाओं का कहना है कि धार्मिक और रिहायशी क्षेत्र में ठेका सामाजिक सुरक्षा और सांस्कृतिक मूल्यों पर सीधा आघात है। अब आंदोलन और तेज होने के संकेत हैं।

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