मुख्यपृष्ठस्तंभभोजपुरिया व्यंग्य :  आम जइसे चूसात बा बेचारा आम आदमी

भोजपुरिया व्यंग्य :  आम जइसे चूसात बा बेचारा आम आदमी

प्रभुनाथ शुक्ल, भदोही

जेठ-असाढ़ के महीना आवत ही आम के सुगंध हवा में घुल जाएला। आम देखत ही मुंह में पानी आ जाला। आखिर आम के मिठासे अइसन बा कि राजा होखे चाहे रंक, नेता होखे चाहे मतदाता, सभे के दिल पर राज करे ला। बाकि आम खाए के भी अपना-अपना तरीका होला। केहू छील के खाला, केहू काट के, त केहू जूस बना के। बाकिर पूर्वांचल के असली रसिक त आम के ‘चूसे’ में विश्वास रखेला।
हमार गांव-जवार में पकल आम के ‘कोपर’ कहल जाला। जब कवनो मेहमान आवेला त पूछल जाला– ‘का हो, कोपर चटब?’ ई सवाल सुनत ही आदमी समझ जाला कि सम्मान के स्तर बढ़ गइल बा। आम के अइसन दबावल जाला कि ओकरा भीतर के हर बूंद रस बाहर निकल आवे। फेर मुंह लगा के अइसन चूसल जाला कि बेचारा गुठली तक सफेद पड़ जाले। आम सोचत रह जाला कि ऊ फल बा कि सरकारी योजना, जवन पूरा निचोड़ लिहल गइल!
बाकि असली मजा त तब बा जब हम समाज के ओर नजर डालीं। एह देश में खाली आमे ना चूसाइल बा, आम आदमी त ओकरो से आगे निकल गइल बा। ऊ जन्म से लेके बुढ़ापा तक चूसाइल जात बा। स्कूल में फीस चूसेला, अस्पताल में बिल चूसेला, सड़क पर टोल चूसेला, बाजार में टैक्स चूसेला आ सरकारी दफ्तर में बाबू फाइल के बहाना बना के जे बचल-खुचल बा, ऊ भी चूस लेला।
राजनीति के मौसम में त आम आदमी के कीमत आम से भी जादे बढ़ जाला। चुनाव आवते नेता लोग ओकरा घर तक पहुंच जाला। हाथ जोड़ के कहेला, रउआ हमरा परिवार हर्इं। वोट पड़ते ही परिवार वाला रिश्ता अगिला चुनाव तक खातिर कोल्ड स्टोरेज में रख दिहल जाला। पांच बरिस तक जनता चूसात रहेला आ नेता मलाई चाटत रहेला।
आज हालत ई बा कि हर आदमी दोसरा के चूसे में लागल बा। बड़ा छोटका के, छोटका आउर छोटका के। कहीं जाति के नाम पर, कहीं धर्म के नाम पर, कहीं विकास के नाम पर। चूसना अब कला ना, पूरा उद्योग बन गइल बा।
एह से अगिला बेर जब रउआ आम चूसीं त एक बेर जरूर सोचब कि बेचारा आम आ आम आदमी में आखिर फर्क का बा? दुनु के नसीब एक्के बा, जेतना रस बा, उहे तक पूछ बा; रस खतम, त सम्मानो खतम!
!!समाप्त!!

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