मुख्यपृष्ठस्तंभमुस्लिम वर्ल्ड: सबसे ज्यादा कुवैत को क्यों ठोकता है ईरान?

मुस्लिम वर्ल्ड: सबसे ज्यादा कुवैत को क्यों ठोकता है ईरान?

सूफी खान

-अंदर की बात समझिए

बुधवार और गुरुवार को ईरान ने मिडिल ईस्ट के जिस अरब देश की सबसे ज्यादा पिटाई की है, वो है कुवैत। अब सवाल ये है कि आखिर ईरान ने कुवैत को ही क्यों चुना? क्या ये कुवैत पर सीधा हमला था या फिर अमेरिका को दिया गया एक रणनीतिक संदेश?
दरअसल, कुवैत मिडिल ईस्ट में अमेरिका का अहम सहयोगी है। वो अमेरिका को अपनी जमीन देता है। कुवैत में अमेरिका के हवाई और समुद्री अभियानों को कंट्रोल करने वाले अड्डे हैं। कुवैत में लगभग १३ हजार अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। अली अल-सलेम एयर बेस समेत कई सैन्य सुविधाएं अमेरिकी अभियानों के लिए लॉजिस्टिक सपोर्ट, निगरानी और त्वरित तैनाती का केंद्र रही हैं।
ऐसे में ईरान के भीषण हमलों को देखकर लगता है कि ईरान की रणनीति केवल सीधे अमेरिकी ठिकानों को नुकसान पहुंचाने तक सीमित नहीं रही। उसने उन देशों पर भी दबाव बनाने की कोशिश की, जहां से अमेरिका को सैन्य सहयोग मिल सकता था। कुवैत इस एंगल से ईरान का सबसे बड़ा निशाना है। ईरान ये भी दोहराता रहा है कि उसका मकसद कुवैत से जंग नहीं है, लेकिन जो ईरान के खिलाफ अमेरिका की मदद करेगा वो ईरान के हमलों का शिकार होगा। फिर ईरान ये नहीं देखेगा कि कहां मिसाइल मार रहा है। ईरान चाहता था कि कुवैत अपने यहां से अमेरिकी सेना की मौजूदगी कम करे या कम से कम अमेरिका को मिलने वाली सैन्य सुविधाओं और हवाई क्षेत्र के उपयोग पर प्रतिबंध लगाए।
यदि कुवैत से अमेरिकी सैन्य संचालन की क्षमता सीमित हो जाती है, तो अमेरिका के लिए ईरान के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई करना मुश्किल होता जाएगा। हालांकि, कुवैत ने ईरान के इन आरोपों और दावों को खारिज कर दिया। कुवैती सरकार का कहना है कि उसने अपनी भूमि का इस्तेमाल किसी तीसरे देश पर हमला करने के लिए नहीं होने दिया है। लेकिन एक कड़वी सच्चाई तो यही है कि ईरान पर अरब देशों के अमेरिकी ठिकानों से ही हमले होते हैं और जब ईरान इजरायल पर अटैक करता है तो उसकी ८० प्रतिशत मिसाइल अरब देश ही रोकते हैं। लेकिन वो अपनी मजबूरी ये बताते हैं कि मिसाइलें वो नहीं रोकते, बल्कि अमेरिका उनकी जमीन से रोकता है। उनकी जमीन पर अमेरिकी डिफेंस सिस्टम क्यों और किसलिए लगे हैं, ये कोई राज तो नहीं है।
एक्सपर्ट कहते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम ने खाड़ी देशों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। एक ओर वे अमेरिका के सुरक्षा साझेदार हैं, वहीं दूसरी ओर वे ईरान के साथ सीधे टकराव से भी बचना चाहते हैं। लेकिन जब उनके यहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हों, तो वे अनचाहे ही किसी बड़े क्षेत्रीय संघर्ष का हिस्सा बन सकते हैं। यानी गलती अमेरिका और इजरायल की लेकिन, खामियाजा भुगत रहे हैं खाड़ी के वो लोग जो इसमें शामिल तक नहीं हैं। यदि तनाव इसी तरह बढ़ता रहा, तो इसका असर सिर्फ ईरान और अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरा मध्य-पूर्व एक व्यापक संघर्ष की चपेट में आ सकता है।

अन्य समाचार