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उड़न छू: ब्लू स्टार पर सवार भाजपा

अजय भट्टाचार्य

किसान आंदोलन के समय सत्ता प्रतिष्ठान और उसके अनुषांगिक संगठनों, गोदी मीडिया, आईटी सेल, ट्रोल आर्मी आदि सबने मिलकर किसानों को ‘खालिस्तानी’ कहा था। उसी खालिस्तानी सोच के मुखिया के खात्मे यानी ऑपरेशन ब्लू स्टार की बरसी पर पिछले शनिवार को अमृतसर के मेहता चौक में दमदमी टकसाल मुख्यालय द्वारा आयोजित ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ की वर्षगांठ में संघ से जुड़े नेता और महाराष्ट्र सरकार के एक मंत्री मौजूद थे। सवाल यह है कि भिंडरावाले के बारे में माननीय मंत्रीजी की क्या राय है? यह पहली बार था जब किसी राज्य सरकार का कोई आधिकारिक प्रतिनिधि इस कार्यक्रम में शामिल हुआ। मंच पर मंत्रीजी ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार को सिख समुदाय के पवित्र स्थल पर एक सैन्य हमला करार दिया और इसे इतिहास का एक ‘काला दिन’ बताया। मंत्रीजी को साफ करना चाहिए कि भारत के पूर्व थलसेना अध्यक्ष जनरल अरुण श्रीधर वैद्य की पुणे में खालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा की गई हत्या पर उनकी पार्टी और सरकार का क्या रुख है। यह हत्या स्वर्ण मंदिर में खालिस्तानी आतंकियों को बाहर निकालने के लिए किए गए ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के प्रतिशोध में की गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह भी खालिस्तानी आतंक की बलि चढ़े थे।
यह भी याद रखने वाली बात है कि संसद में संत जरनैल सिंह भिंडरावाले के बारे में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान से कई सिखों में नाराजगी थी। अगर संघ और भाजपा नेता दमदमी टकसाल के मंच पर सम्मानित अतिथि बनकर पहुंचे थे, तो उनसे कम से कम यह तो पूछा जाना चाहिए था कि क्या अमित शाह अपने साथियों के ऐसे बयानों से सहमत हैं? अमित शाह ने संसद में जरनैल सिंह भिंडरावाले का सीधा नाम लेते हुए चेतावनी दी थी कि पंजाब में जो लोग ‘भिंडरावाले बनने की कोशिश कर रहे थे, वे अब असम की जेल में गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ कर रहे हैं।’ उन्होंने यह बात राज्य सभा में चरमपंथियों और अलगाववादियों पर कार्रवाई का जिक्र करते हुए कही थी। उन्होंने यह बयान खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह से जुड़ी परिस्थितियों और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर दिया था।
ऑपरेशन ब्लू स्टार के समय पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि स्वर्ण मंदिर के भीतर सेना भेजना देश के लिए घातक परिणाम लाएगा और यह कदम सही नहीं था, लेकिन आतंकवादियों द्वारा मंदिर के अंदर की गई घेराबंदी के कारण यह कार्रवाई ‘अपरिहार्य’ हो गई थी। मतलब अटलजी आतंक के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के खिलाफ नहीं थे। मंच से १९८४ के दरबार साहिब हमले के लिए इंदिरा गांधी को दोषी ठहराना आसान है। लेकिन क्या उस दौरान संघ और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की भूमिका को भी याद दिलाया गया?
अपनी आत्मकथा ‘माई कंट्री माई लाइफ’ में भाजपा मार्गदर्शक मंडल में विश्राम कर रहे लाल कृष्ण आडवाणी ने जिक्र किया है कि भाजपा ने जरनैल सिंह भिंडरावाले के उग्रवादियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए सरकार पर भारी दबाव डाला और आंदोलन किया, जिसके कारण आखिरकार इंदिरा गांधी को सेना का इस्तेमाल करना पड़ा। उनका कहना था कि पवित्र स्थल के भीतर राज्य सरकार के अधिकार के समर्पण के जवाब में यह कार्रवाई जरूरी थी।
कई सिख संगठन संघ की इस विचारधारा का विरोध करते हैं कि सिख धर्म हिंदू धर्म का ही एक अंग है। संघ ने सिखों के बीच पैठ बनाने के लिए ‘राष्ट्रीय सिख संगत’ नामक एक इकाई बनाई है। कई सिख संस्थाओं का मानना है कि यह संस्था सिखों का हिंदूकरण करने और उनकी स्वतंत्र पहचान मिटाने का एक राजनीतिक एजेंडा है। नतीजा साफ है कि ताकतवर टकसाल और संघ के बीच का गठबंधन अब छिपा नहीं है। इसलिए सिखों को सतर्क रहना चाहिए। जिनकी सोच गुरमत सोच के खिलाफ है, अब शर्म खो चुके हैं। पंजाब के अगले विधानसभा चुनावों में भिंडरावाले की तस्वीर के साथ भाजपा वोट मांगती नजर आये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)

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