मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका: लोकतंत्र पर अदृश्य कब्जा

पॉलिटिका: लोकतंत्र पर अदृश्य कब्जा

के.पी. मलिक

हिंदुस्थान की सियासत को समझने की कोशिश करनेवाला अधिकांश नागरिक वही देखता है, जो टीवी स्क्रीन पर दिखाई देता है। चुनावी रैलियां, नेताओं के भाषण, संसद में हंगामा, टीवी डिबेट, सोशल मीडिया की बहसें और चुनावी नतीजे। लेकिन क्या राजनीति वास्तव में इतनी ही है? क्या लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने का नाम है? या फिर लोकतंत्र का असली खेल उन संस्थाओं के भीतर चलता है जो सुर्खियों में कम और पैâसलों में ज्यादा दिखाई देती हैं? इसी सवाल से जुड़ती है ‘द अनसीन मैनिफेस्टो’ की अवधारणा। यह कोई आधिकारिक दस्तावेज नहीं, बल्कि एक राजनीतिक विचार है। इसका आशय उन बदलावों से है जो बिना बड़े सार्वजनिक विमर्श के धीरे-धीरे संस्थाओं, कानूनों, नियुक्तियों और प्रशासनिक संरचनाओं के माध्यम से लागू होते हैं। ये बदलाव अखबारों की मुख्य खबर नहीं बनते, लेकिन लंबे समय में देश की दिशा तय कर सकते हैं।
संस्थाओं का नेटवर्क
किसी भी लोकतंत्र की मजबूती केवल इस बात से तय नहीं होती कि चुनाव कितने नियमित हो रहे हैं। उसकी असली ताकत उन संस्थाओं में होती है जो सत्ता को संतुलित करती हैं। भारत में ऐसी संस्थाओं में चुनाव आयोग, न्यायपालिका, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, संसद की समितियां, सूचना आयोग, नियामक संस्थाएं और स्वतंत्र मीडिया शामिल हैं। इनका उद्देश्य केवल प्रशासन चलाना नहीं, बल्कि सरकार को जवाबदेह बनाए रखना भी है। जब ये संस्थाएं स्वतंत्र और मजबूत होती हैं, तब लोकतंत्र मजबूत होता है। जब इनकी स्वायत्तता पर सवाल उठते हैं, तब लोकतंत्र की गुणवत्ता पर भी सवाल उठने लगते हैं।
आरटीआई की कहानी
पिछले दो दशकों में सूचना का अधिकार (आरटीआई) भारत के लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण उपकरण बनकर उभरा। हजारों नागरिकों और कई सेवानिवृत्त अधिकारियों ने इसी कानून के माध्यम से सरकारी पैâसलों और प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए। कई मामलों में आरटीआई के जरिए ऐसे तथ्य सामने आए, जो सामान्य परिस्थितियों में जनता तक नहीं पहुंच पाते। लेकिन समय के साथ कई पारदर्शिता समर्थकों ने यह चिंता जताई कि सूचना प्राप्त करना पहले की तुलना में अधिक कठिन होता जा रहा है। सूचना आयोगों में लंबित मामलों की संख्या बढ़ी है और जवाब मिलने में देरी की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। यह बहस केवल आरटीआई की नहीं है। यह उस व्यापक प्रश्न की है कि लोकतंत्र में नागरिकों को सरकार के बारे में कितना जानने का अधिकार होना चाहिए।
रेगुलेटरी कैप्चर?
राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में ‘रेगुलेटरी वैâप्चर’ एक प्रसिद्ध अवधारणा है। इसका अर्थ है कि कोई नियामक संस्था, जिसे जनता के हितों की रक्षा करनी चाहिए, धीरे-धीरे उन्हीं शक्तिशाली समूहों के प्रभाव में आ जाए, जिन्हें वह नियंत्रित करने के लिए बनाई गई थी। भारत में समय-समय पर विभिन्न नियामक संस्थाओं जैसे सेबी, सीसीआई और ट्राई की स्वतंत्रता को लेकर बहस होती रही है। इन संस्थाओं का काम बाजार, प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता हितों की रक्षा करना है। आलोचकों का तर्क है कि यदि नियुक्तियों, निर्णयों या नीतियों पर राजनीतिक या कॉर्पोरेट प्रभाव बढ़ता है तो संस्थाओं की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर सरकारों का तर्क होता है कि नियुक्तियां संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं के तहत होती हैं और संस्थाएं स्वतंत्र रूप से काम करती हैं। यहीं से लोकतांत्रिक बहस शुरू होती है।
टकराव या संतुलन?
भारतीय लोकतंत्र में ‘भारत का चुनाव आयोग’ और ‘भारत का सर्वोच्च न्यायालय’ दो अत्यंत महत्वपूर्ण संस्थाएं हैं। हाल के वर्षों में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया, चुनावी पारदर्शिता और संस्थागत स्वायत्तता जैसे मुद्दों पर सार्वजनिक बहस तेज हुई है। कुछ मामलों में सर्वोच्च न्यायालय और सरकार के बीच संवैधानिक प्रक्रियाओं की व्याख्या को लेकर मतभेद भी सामने आए। लोकतंत्र में यह असामान्य नहीं है। वास्तव में शक्तियों के पृथक्करण की व्यवस्था इसी सिद्धांत पर आधारित है कि अलग-अलग संस्थाएं एक-दूसरे पर निगरानी रखें और संतुलन बनाए रखें। लेकिन जब ऐसे मतभेद लगातार सुर्खियों में आने लगते हैं, तब नागरिकों के मन में संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक हो जाता है।
संसदीय समीक्षा की गिरती भूमिका
लोकतांत्रिक शासन में संसद केवल कानून पारित करने का मंच नहीं होती। उसका एक महत्वपूर्ण कार्य कानूनों की गहन समीक्षा भी है। भारत में संसदीय स्थायी समितियों को इसी उद्देश्य से बनाया गया था, ताकि किसी विधेयक के कानूनी, आर्थिक और सामाजिक प्रभावों का विस्तार से अध्ययन किया जा सके। कई राजनीतिक विश्लेषकों और संसदीय अध्ययनों में यह चिंता व्यक्त की गई है कि पिछले वर्षों में संसदीय समितियों को भेजे जानेवाले विधेयकों का फीसद काफी कम हुआ है। इसी संदर्भ में ‘१३ फ़ीसदी’ जैसे आंकड़ों का उल्लेख किया जाता है, जिनका उपयोग यह दिखाने के लिए किया जाता है कि बहुत कम विधेयक विस्तृत समिति समीक्षा के लिए भेजे जा रहे हैं। हालांकि, अलग-अलग वर्षों और स्रोतों में आंकड़े भिन्न हो सकते हैं, लेकिन व्यापक बहस का विषय यह है कि क्या संसद की जांच-पड़ताल की भूमिका कमजोर हो रही है। यदि कानून बिना पर्याप्त समीक्षा के पारित होते हैं तो नीति निर्माण की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
अदालतों में ‘घिसाई’ की रणनीति
कानूनी विशेषज्ञ एक और अवधारणा की चर्चा करते हैं, जिसे अनौपचारिक रूप से ‘जुडिशियल एट्रीशन’ कहा जाता है। इसका अर्थ है किसी मामले को वर्षों तक कानूनी प्रक्रियाओं में उलझाए रखना, जिससे याचिकाकर्ता आर्थिक, मानसिक और समयगत दबाव का सामना करे। भारत की अदालतों में लंबित मामलों की बड़ी संख्या पहले से ही एक गंभीर चुनौती है। ऐसी स्थिति में न्याय में देरी कभी-कभी न्याय के प्रभाव को भी कम कर सकती है। लोकतंत्र केवल अदालतों के अस्तित्व से मजबूत नहीं होता, उसे समय पर और प्रभावी न्याय भी चाहिए।
क्या स्टील फ्रेम में दरार आ रही है?
भारत की नौकरशाही को कभी ‘स्टील फ्रेम’ कहा जाता था। यह शब्द प्रशासनिक तंत्र की स्थिरता और पेशेवर निष्पक्षता का प्रतीक माना जाता था।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में वरिष्ठ अधिकारियों के समयपूर्व स्थानांतरण, राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक स्वतंत्रता पर बहस बढ़ी है। कई पूर्व नौकरशाहों ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि निर्णय लेने की स्वतंत्रता पहले जैसी नहीं रही। वहीं सरकार का कहना है कि प्रशासनिक जवाबदेही और दक्षता बढ़ाने के लिए सुधार आवश्यक हैं। सच्चाई शायद इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच कहीं मौजूद है।
बाजार का दबाव?
आज लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। लेकिन मीडिया पर नियंत्रण हमेशा प्रत्यक्ष सेंसरशिप के माध्यम से ही हो, यह जरूरी नहीं। कई मीडिया विशेषज्ञ ‘मार्वेâट सेंसरशिप’ या ‘बाजार आधारित सेंसरशिप’ की अवधारणा की चर्चा करते हैं। इसमें सरकारी विज्ञापन, कॉर्पोरेट विज्ञापन, निवेशकों का दबाव, स्वामित्व संरचना और व्यावसायिक हित संपादकीय स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में कोई खबर औपचारिक रूप से प्रतिबंधित नहीं होती, लेकिन उसके प्रसारण की संभावना कम हो जाती है। यही कारण है कि मीडिया स्वतंत्रता की चर्चा केवल सरकारी हस्तक्षेप तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आर्थिक संरचनाओं तक भी जाती है।
भारत लोकतंत्र खो रहा है
यह शायद सबसे बड़ा और सबसे विवादास्पद प्रश्न है। एक पक्ष कहता है कि भारत में नियमित चुनाव होते हैं, सरकारें बदलती हैं, अदालतें काम करती हैं, मीडिया सक्रिय है और नागरिकों को मतदान का अधिकार प्राप्त है इसलिए लोकतंत्र मजबूत है। दूसरा पक्ष तर्क देता है कि लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं होता। संस्थागत स्वतंत्रता, जवाबदेही, पारदर्शिता और असहमति के लिए सुरक्षित स्थान भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। सच्चाई को केवल दो रंगों में नहीं देखा जा सकता। भारत आज भी दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन किसी भी लोकतंत्र की तरह उसकी संस्थाओं की मजबूती, पारदर्शिता और स्वतंत्रता पर लगातार निगरानी और सार्वजनिक बहस आवश्यक है।
बहरहाल, लोकतंत्र का असली संघर्ष पर्दे के पीछे होता है, लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण संघर्ष हमेशा चुनावी मंचों पर नहीं लड़ा जाता। कई बार वह नियुक्तियों में छिपा होता है। कई बार कानून बनाने की प्रक्रिया में, कई बार अदालतों की गति में, कई बार सूचना तक पहुंच में और कई बार उन खबरों में जो कभी मुख्यधारा की सुर्खियां नहीं बन पातीं।
‘द अनसीन मैनिफेस्टो’ दरअसल, इसी अदृश्य राजनीति को समझने का एक प्रयास है। दरअसल, सवाल यह नहीं है कि भारत लोकतंत्र है या नहीं।
बल्कि सवाल यह है कि लोकतंत्र की संस्थाएं कितनी स्वतंत्र, जवाबदेह और मजबूत बनी हुई हैं, क्योंकि इतिहास बताता है कि लोकतंत्र अचानक खत्म नहीं होते। वे धीरे-धीरे बदलते हैं और अक्सर जब लोग उस बदलाव को पहचानते हैं, तब तक बहुत कुछ बदल चुका होता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, आलोचक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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