प्रमोद भार्गव
शिवपुरी म.प्र.
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में क्षेत्रीय विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। ये चुनाव 27 जुलाई को होने हैं। चुनावों में कुल 45 सीटों में से 12 सीटें शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं, किंतु गुलाम जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) को शरणार्थियों के लिए आरक्षित सीटें मंजूर नहीं है। इसलिए जम्मू-कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान के लोग जबरदस्त विरोध पर उतर आए हैं। इस विरोध के चलते अब तक 46 प्रदर्शनकारी मारे जा चुके हैं, 200 से अधिक घायल हैं और करीब 1,100 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी हैं। पाक आर्मी और पुलिस के इस दमन एवं नरसंहार से आंदोलनकारियों का गुस्सा और भड़क गया है। इस जोश और नाराजगी को दबाने के लिए पूंछ, मीरपुर एवं मुजफ्फराबाद में बड़ी संख्या में अतिरिक्त अर्ध सैनिक बल तैनात कर दिए हैं। दरअसल, लोगों का गुस्सा इसलिए फूट रहा है, क्योंकि ये चुनाव अंतरराष्ट्रीय समुदाय एवं मानवाधिकार आयोग को यह दिखाने के लिए कराए जा रहे हैं कि पाकिस्तान लोकतंत्र का पैरोकार है। लेकिन यह पूरा नाटक फरेब की नौटंकी के अलावा कुछ नहीं है। भारत भी इस चुनाव के विरोध में है।
इस विरोध का प्रमुख कारण पीओजेके में विधानसभा की 45 निर्वाचित सीटों में से 12 सीटों का शरणार्थियों के लिए आरक्षित करना है। जेएएसी का आरोप है कि इन सीटों के कारण स्थानीय लोगों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रभावित हो रहा है। संगठन लंबे समय से इन सीटों को समाप्त करने की मांग कर रहा है। चुनाव के ठीक पहले यह मुद्दा राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील बन गया है। इस मुद्दे के साथ-साथ आमजन बढ़ती महंगाई, गेहूं और आटे की उपलब्धता में कमी, बिजली की दरों में वृद्धि, बेरोजगारी तथा स्थानीय प्रशासनिक अधिकारों की मांग को भी आगे बढ़ा रहा है। दरअसल, शरणार्थियों के लिए सीटें आरक्षित करने का मतलब, स्थानीय लोगों को जनप्रतिनिधित्व से बहिष्कृत करने का संवैधानिक उपाय पाकिस्तान ने मान लिया है। अतएव ये चुनावी फरेब पीओजेके पर अवैध कब्जे को वैध ठहराने का उपाय भर है। पाकिस्तान इस चुनाव के जरिए यह जताने का उपक्रम कर लेता है कि वह लोकतंत्र का पक्षधर होने के साथ भू-राजनीतिक शक्ति भी है। इस परिप्रेक्ष्य में भारत को इस चुनावी हथकंडे को राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के परिदृष्य में इसे एक बड़े मुद्दे के रूप में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष पेश करने के साथ हस्तक्षेप की मांग करने की जरूरत है। हालांकि, पीओके में हुई हिंसा को लेकर भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पाक पर करारा हमला बोला है। कहा है कि पाकिस्तान को उसके दुष्कर्मों और मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए उत्तरदायी ठहराना चाहिए। पाकिस्तान अपनी आंतरिक विफलताओं को छुपाने और मानवाधिकार उल्लंघनों से ध्यान भटकाने के लिए झूठी खबरों और फर्जी वीडियो का सहारा ले रहा है, जबकि पीओजेके में आर्मी और पुलिस ने बर्बर कार्यवाही की है। हम उम्मीद करते हैं कि विश्व समुदाय पाक के इन कृत्यों के लिए उसे जवाबदेह ठहराएगा।
इसी बीच संयुक्त राष्ट्र संघ के गलियारों से ऐसी खबर आई है, जिसने आतंकवाद के मुद्दे पर वैश्विक कूटनीति के दोहरे मानदंडों को एक बार फिर से उजागर कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में पाकिस्तान और चीन की एक साझा बौर बेहद महत्वाकांक्षी कोशिश को अमेरिका ने पूरी तरह से असफल कर दिया। इन दोनों देशों ने बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) और उसके आत्मघाती दस्ते ‘मजीद ब्रिगेड‘ को वैश्विक आतंकी संगठन घोशित करने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया था, जिस पर अमेरिका ने फ्रांस और ब्रिटेन के साथ मिलकर वीटो लगा दिया है। जबकि दिलचस्प बात है कि खुद अमेरिका ने 2019 में बीएलए और मजीद ब्रिगेड को अपनी घरेलू फाॅरेन टेरिरिस्ट आर्गेनाइजेशन सूची में शामिल किया था। बावजूद वैश्विक मंच पर चीन और पाकिस्तान के इस साझा प्रस्ताव को अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों द्वारा रोका जाना एक बड़ा कूटनीतिक संदेश है। यह वही चीन है, जिसने अतीत में भारत और अमेरिका द्वारा पाकिस्तानी आतंकियों को वैश्विक प्रतिबंधित आतंकवादी सूची में डालने से जुड़े कई प्रस्तावों पर वीटों लगा दिया था। सुरक्षा परिषद का यह घटनाक्रम संकेत देता है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई केवल सरहदों पर ही नहीं, बल्कि बंद कमरों में भी कुटिल कूटनीति के लिए लड़ी जाती है। पीओजेके में वर्तमान नरसंहार को लेकर ब्रिटेन के 50 सांसदों ने भी अंतरराष्ट्रीय समुदायों के समक्ष चिंता जताई है। भारत को पीओजेके में उभरे इस आंतरिक संकट और नरसंहार से सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि धूर्त पाकिस्तान इस ओट में अपनी पुरानी और नापाक चालें चलते हुए प्रशिक्षित आतंकियों की भारतीय सीमा में घुसपैठ कराने की चाल चल सकता है। हालांकि, भारतीय खुफिया एजेंसी आईबी ने चेतावनी दी है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई इस अराजकता और खून-खराबे की आड़ में नियंत्रण रेखा पर आतंकियों की घुसपैठ कराकर जम्मू-कष्मीर तथा भारत के अन्य नगरों में हिंसा व अशांति फैलाने की दृष्टि से आत्मघाती हमले करा सकती है। हालांकि, भारतीय सुरक्षा बल हाई अलर्ट पर हैं।
पीओजेके की परिधि में आने वाले गिलगित-बाल्टिस्तान वास्तव में भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य के हिस्सा हैं। बावजूद पाकिस्तान के नाजायज कब्जे में हैं, लेकिन यहां के नागरिकों ने इस बलात कब्जे को कभी नहीं स्वीकारा। यहां तभी से राजनीतिक अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक आवाजें उठ रही हैं और पाक सरकार इन लोगों पर दमन और अत्याचार का सिलसिला जारी रखे हुए है। साफ है, पाक की आजादी के साथ गिलगिट-बाल्टिस्तान का मुद्दा जुड़ा हुआ है। पाक की कुल भूमि का 40 फीसदी हिस्सा यहीं है, लेकिन इसका विकास नहीं हुआ है। करीब 1 करोड़ 30 लाख की आबादी वाले इस हिस्से में सर्वाधिक बलूच हैं, इसलिए इसे गिलगिट-बलूचिस्ताल भी कहा जाता है। पाक और बलूचिस्तान के बीच संघर्ष 1945, 1958, 1962-63, 1973-77 में होता रहा है। 77 में पाक द्वारा दमन के बाद करीब 2 दषक तक यहां षांति रही, लेकिन 1999 में परवेज मुशर्रफ सत्ता में आए तो उन्होंने बलूच भूमि पर सैनिक अड्डे खोल दिए। इसे बलूचों ने अपने क्षेत्र पर अवैध कब्जे की कोशिश माना और फिर से संघर्ष तेज हो गया। इसके बाद यहां कई अलगाववादी आंदोलन वजूद में आए, इनमें प्रमुख बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी है।
फिलहाल, यहां 27 जुलाई को चुनाव होना है, लेकिन निर्वाचन की प्रक्रिया से गुजरने के बावजूद भी यहां की विधानसभा को अपने बूते कोई कानून बनाने का अधिकार नहीं है। सारे फैसले एक परिषद लेती है, जिसके अध्यक्ष पाकिस्तान के पदेन प्रधानमंत्री होते हैं। लिहाजा, चुनाव के बावजूद भी यहां विद्रोह की आग सुलगी रहती है। यह आग उन सब इलाकों में सुलगी रहती है, जो शिया बहुल हैं। सुन्नी बहुल पाकिस्तान में शिया और अहमदिया मुस्लिमों समेत सभी धार्मिक अल्पसंख्यक प्रताड़ित किए जा रहे हैं। अहमदिया मुस्लिमों के साथ तो पाक के मुस्लिम समाज और हुकूमत ने भी ज्यादती बरती है। 1947 में उन्हें गैर मुस्लिम घोषित कर दिया गया था। तब से वे न केवल बेगाने हैं, बल्कि हिंदू, सिख व ईसाइयों की तरह मजहबी चरमपंथियों के निशाने पर भी रहते हैं। मई 2010 में लाहौर में एक साथ दो अहमदी मस्जिदों पर कातिलाना हमला बोलकर करीब एक सौ निरीह लोगों की हत्या कर दी गई थी।
इस क्षेत्र में चीन बड़ा निवेश कर रहा है। ग्वादर में एक बड़ा सा बंदरगाह बनाया है। चीन की एक और बड़ी योजना है, ‘चाइना-पाकिस्तान इकोनाॅमिक काॅरिडोर‘ इसकी लागत 3 लाख 51 हजार करोड़ है। यह गलियारा गिलगिट-बाल्टिस्तान से गुजर रहा है। इस गलियारे के निर्माण में लगे चीनी नागरिकों की आतंकी संगठन बीएलए हत्याएं कर रहा है। चूंकि यह क्षेत्र अधिकारिक रूप से भारत का है, इसलिए भारत भी इस परियोजना का लगातार विरोध कर रहा है। पाकिस्तान रणनीतिक रूप से गिलगित-बाल्टिस्तान को पांचवां प्रांत बना लेने की फिराक में लगा है। चूंकि यह क्षेत्र आधिकारिक रूप से भारत के जम्मू-कश्मीर प्रांत का हिस्सा है, इसलिए यहां कोई भी बदलाव कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन होगा। अतएव इन क्षेत्रों को पाकिस्तान के कब्जे से मुक्त करना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति होना चाहिए, क्योंकि भारत के पास अपनी-अपनी स्थिति को मजबूती से रखने के लिए राजनीतिक कानूनी और संवैधानिक आधार मौजूद हैं।पाकिस्तान यहां सुन्नी मुसलमानों की संख्या बढ़ाकर इस पूरे क्षेत्र का जनसंख्यात्मक घनत्व बदलने के प्रयास में भी लगा है। इन कारणों के चलते यहां के मूल बलूचों की पाकिस्तान के प्रति जबरदस्त नाराजी है और वे निर्णायक लड़ाई लड़के भारत में विलय होने की कोशिश में लगे हैं।
