विमल मिश्र / मुंबई
-आप जापान जाएं तो हर जगह आप को ‘दौइताशिमाशिते’ और ‘आरीगातो गोजाइमास’ की गूंज ही सुनाई देगी। स्वागत और धन्यवाद के शब्द। यह कला किसी को भी सीखनी चाहिए।
बड़े-बड़े मॉल्स, शॉपिंग कांप्लेक्स और इंटरटेनमेंट हब के लिए मशहूर टोक्यो का गिंजा इलाका। दुनियाभर से आए ग्राहकों और सामानों से भरी उनकी विशाल दुकानों के दूर तक पैâले विस्तार में शॉपिंग करते निढाल हो जाएं, तो आपको कहीं भी बैठने की जगह नहीं मिलेगी। ऐसे में मेरे भांजे का आठ वर्षीय बेटा थका हारा मॉल के एक कोने में जमीन पर बैठकर खेलने लगा था, तभी देखा था इस सेल्समैन को, जो बार–बार ‘सुमिमासेन’ (सॉरी) और ‘शित्सुरेई शिमासित’ (आपकी सुविधा में खलल डालने के लिए मुझे माफी दीजिए) की रट के साथ रंजीदा चेहरा लिए, हमारे सामने विनम्रता से दोहरा होता चला जा रहा था। जापानियों की विनम्रता से परिचय जहां कदम रखने के लिए पहले ही आठ घंटों में ही कई बार हो चुका था, अब परिचय हुआ उनके एक और नए रूप से, जब कोई शख्स हमारी अपनी गलती या चूक के लिए बगैर ‘सॉरी’ की अपेक्षा किए, उल्टे हमसे ही बार-बार माफी मांगे जा रहा था।
आप जापान जाएं तो हर जगह आप को ‘दौइताशिमाशिते’ और ‘आरीगातो गोजाइमास’ की गूंज सुनाई देगी। पहला शब्द स्वागत का और दूसरा धन्यवाद कहने का सबसे आम तरीका। आपने यदि किसी की थोड़ी-सी भी मदद की या नहीं भी की, तब भी धन्यवादों से आपकी झोली भर दी जाएगी।दुकानों में, रेस्तरां, गाड़ी, स्कूल में, यहां तक कि घर में भी, हर कहीं इन शब्दों की गूंज सुनाई देगी। चाहे आपने दुकान से कुछ खरीदा हो या नहीं भी खरीदा हो, आपको धन्यवाद मिलना तय है। यदि आपको कोई जापानी कुछ समय बाद दोबारा मिलेगा तो आप सुनेंगे ‘कोनो आइदा दोमो आरीगातो गोजाइमास’, यानी ‘पिछली बार या इससे पहले जब मिले थे, उस वक्त के लिए धन्यवाद।’ आमने-सामने मिलते वक्त ही नहीं, बल्कि चिट्ठी या ई-मेल द्वारा संवाद के वक्त भी वह पहली बार मिलने का धन्यवाद जरूर देगा। कई बार तो आप भूल ही जाएंगे कि हम इस बंदे से मिले ही कब और कहां थे, लेकिन वह कभी नहीं भूलेगा आपको धन्यवाद करना।
जापानी परिवारों में खाना वैसे ही खाते हैं, जैसा हमारी भारतीय परंपरा में है। प्लेट में सबका खाना लगाना, बांटना और फिर एक साथ खाना, जमीन पर बैठकर। और खाने से पहले हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए समवेत ‘इतादाकिमासु’ बोलना। यानी, भोजन के लिए ईश्वर के प्रति आभार और फिर ‘गोचिसोसामा देता’-शेफ या खाना खिलाने वाले को धन्यवाद। बच्चे भी एक–दूसरे को और शिक्षक को क्लास के बाद धन्यवाद जरूर देते हैं।
शीलनता और सौजन्य
धन्यवाद सिर्फ बोलवचन नहीं, जीने की कला है। कृतज्ञता का भाव, जो अपने भीतर गहराई से बसाते हैं और किसी व्यक्ति के योगदान, परिश्रम, मदद या प्रेम को सच्चे दिल से कबूल करते हैं, महत्व देते हैं और सम्मान करते हैं। अंतत: दूसरों की सहायता को हम अपना फर्ज मानने लगते हैं। यह सोचकर हमने जो पाया है, उसे आगे बांटना हमारा ही काम है। यह अनुभव हमारे जीवन के निर्णयों, दृष्टिकोण और व्यवहार में भी परिलक्षित होने लगता है। धन्यवाद देने से संबंध मजबूत होते हैं, आत्मीय बनते हैं, दूसरों के प्रति आदर पैदा होता है, परस्पर विश्वास बढ़ता है, विनम्रता आती है और अहंकार चला जाता है। छोटा-सा एक धन्यवाद, सहयोग, करुणा और स्नेह के रूप में फलता-फूलता है। आदर देना और बदले में आदर पाना जापान की परंपरा में है। यहां नाम के पीछे ‘सान’ शब्द का इस्तेमाल सम्मान प्रकट करने के लिए किया जाता है। इसीलिए यहां का सबसे मशहूर पर्वत फुजी भी सहज ही ‘फुजी सान’ का संबोधन पा जाता है।
मुस्कुराहट के साथ अत्यंत झुककर विनम्र नमन-जापान के लोगों के व्यवहार में आप एक विचित्र प्रकार की मृदुता देखेंगे। अभिवादन का उनका अंदाज तो बरबस ही मन मोह लेता है। वे एक या दोनों हाथ उठा, अथवा केवल सिर झुकाकर नमस्कार नहीं करते, ऐसा करते समय देह के कमर तक आधे ऊपरी भाग को झुकाते हैं। दोनों घुटने टेककर, सिर भूमि पर रखकर प्रणाम करने का और झुक-झुककर विदा होने का उनका ढंग अपनी निराली ही शान रखता है। हर जापानी किसी से भी मिलने पर ‘कोन्निचिवा’ (हलो) कहकर झुककर अभिवादन अवश्य करता है। सुबह के समय हर कहीं ‘ओहाइयो गोजाइमास’, यानी ‘गुड मॉर्निंग’ की गूंज सुनने को मिलेगी। दोपहर को ‘कोनिचिवा’, यानी ‘गुड आफ्टरनून’ और शाम हो तो ‘कोम्बानवा’ यानी ‘गुड इवनिंग’ की। ‘ओनेगाइशिमास’ और ‘कुदासाई’ ‘कृपया’ कहने के तरीके हैं। ‘दौजो’ ‘लीजिए’ या ‘पहले आप’ कहने के और ‘जाअ, माता’ ‘फिर मिलते हैं’ कहने के। विदा का ‘सायोनारा’ तो सभी ने सुन रखा है।
जापान में मेट्रो, बस और बुलेट ट्रेन सहित सार्वजनिक परिवहन में चुप रहना आत्म अनुशासन का हिस्सा है और जोर से बोलना अशिष्टता। काबुकी या दूसरे मनोरंजन स्थलों के अपवाद को छोड़ दें तो जापानी इतना धीमे बोलते हैं कि सिर्फ संबंधित व्यक्ति को ही सुनाई दे। जापान में कहीं भी घूमते-फिरते वक्त या रेस्तरां में हमें अपने ड्राइवर, गाइड या वेटर की बात सुनने के लिए आगे झुककर अपने कानों को उनके नजदीक ले जाना पड़ा। टोक्यो रेलवे स्टेशन पर बुलेट ट्रेन की प्रतीक्षा करते हुए प्लेटफार्म पर करीब आधा घंटा बिताया। वेटिंग हॉल में तीन से पांच वर्ष की उम्र के कई बच्चे थे, लेकिन कोई शोर नहीं था।
सुंदर सज-धज, रंग-बिरंगे वस्त्र, ओठों पर मधुर मुस्कान, हाथों में फूल-टोक्यो में फुरसती वक्त सुंदर चेहरे आपको कभी भी दिख जाएंगे। पश्चिमी संगीत, प्रसाधन-सामग्री या वेशभूषा का प्रभाव जापान में आज विश्व के किसी भी अन्य देश की तरह है, पर जापानी परंपराओं का अनुपालन के साथ।इनमें शालीनता झलकती है, अश्लीलता नहीं। बदनाम इलाके यहां भी हैं, पर उन्मुक्त यौनाचार तो दूर, युवक-युवतियों के चुंबन के जो दृश्य आपको मुंबई की सड़कों पर भी यदा-कदा दिख जाते हैं, आपको यहां देखने को नहीं मिलेंगे। जापान बहुत महंगा देश है, इसके बावजूद यह पर्यटन के नक्शे पर बहुत आगे है। यहां आए किसी भी विदेशी से इसका कारण पूछिए, वह बताएगा ‘यहां के लोग’। अपने देश में आने वाले लोगों सहयोगी रवैये ने उसकी यह छवि बनाई है। भाषा यहां बड़ी समस्या है। पर, जब किसी जापानी को आपकी कोई बात समझ में नहीं आएगी तो वह आस-पास खड़े किसी दूसरे से उसके बारे में पूछेगा। अगर उससे भी ठीक उत्तर नहीं मिला तो किसी तीसरे से पूछेगा। और आपकी समस्या सुलझ जाएगी। एक मेट्रो स्टेशन में मैं दिशा भ्रम में था, एक बुजुर्ग महिला आई और खुद मुझे मेरे ठिकाने पर छोड़कर गई। हिंदी के जापानी प्रोफेसर इशिदा ने तो मुझे मेरी ट्रेन पकड़ाने के लिए अपनी खुद की ट्रेन भी छोड़ दी।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर
संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)
