हनीफ जवेरी
फिल्मी गाने सिर्फ शब्द और सुरों का मेल नहीं होते, बल्कि हालात की गोद में जन्म लेते हैं। हर गीत के पीछे एक नजारा, एक भावना और एक कहानी छुपी होती है, कभी यह कहानी धीरे-धीरे शब्दों में ढलती है, तो कभी किसी एक पल, एक घटना या किसी शख्स की मौजूदगी से अचानक पूरी शक्ल ले लेती है। गीतकार की कलम कभी सोच-विचार में डूबी रहती है, तो कभी एक चिंगारी ही उसे ऐसा ख्याल दे जाती है, जो सीधे दिल तक पहुंच जाए।
जब निर्देशक गोविंद सरैया ने लेखक गोवर्धनराम माधवराम त्रिपाठी के प्रसिद्ध गुजराती उपन्यास ‘सरस्वतीचंद्र’ पर इसी नाम से फिल्म बनाने की योजना बनाई, तो उन्होंने सबसे पहले संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी और गीतकार इंदीवर को सभी गीतों की स्थिति समझा दी।
इंदीवर ने तुरंत एक गीत का मुखड़ा लिखा-
‘आंखों में चमक, चेहरे पे नमक, धीरे से तेरा ये मुस्काना’
लेकिन शुरुआती लाइनें सरैया को पसंद नहीं आईं। उन्होंने उन्हें बदलने की सलाह दी। जो लाइनें उन्होंने दो मिनट में लिखी थीं, उन्हें बदलने में दो हफ्ते लग गए, लेकिन जो नई लाइनें लिखी गईं, वे कमाल की थीं-
‘चंदन सा बदन, चंचल चितवन, धीरे से तेरा ये मुस्काना’
अब देखिए, एक गाने को मुकम्मल करने में जहां दो सप्ताह लगे, वहीं दूसरा गाना एक झटके में लिखकर तैयार हो गया। हुआ यूं कि एक स्थिति के अनुसार एक युगल रोमांटिक गीत इंदीवर को लिखना था। वे कल्याणजी-आनंदजी के म्यूजिक सिटिंग रूम में बैठे थे। इत्तेफाक से फिल्म सरस्वतीचंद्र के निर्माता गोविंद सरैया भी वहां मौजूद थे। तभी पोस्ट डिलिवरी से एक नौकर चिट्ठियां लाकर कल्याणजी को दे गया, जो उनकी पैâन मेल थी। यूं ही गपशप करते हुए कल्याणजी एक-एक करके चिट्ठियां खोलकर देखने लगे। तभी उनके हाथ एक ऐसी चिट्ठी लगी, जिसमें चिट्ठी के साथ एक गुलाब का फूल भी था। यह चिट्ठी उनकी एक प्रशंसिका ने कुछ यूं लिखी थी—
‘फूल तुम्हें भेजा है खत में, फूल नहीं मेरा दिल है।
बंधु मेरे मुझको लिखना क्या यह तुम्हारे काबिल है?’
यह लाइनें कल्याणजी ने मजाक-मजाक में सरैया और इंदीवर को सुनाई। तुरंत इंदीवर ने खत में लिखे बंधु शब्द को बदलकर ‘प्रियतम’ कर दिया और खत के जवाब के रूप में आगे कहा, ‘प्यार छुपा है खत में इतना, जितने सागर में मोती, चूम ही लेता हाथ तुम्हारा, पास जो तुम मेरे होती।’
फिर क्या था, सरैया ने इसी पर गाना लिखने को कह दिया और फिल्म में थोड़ी-सी स्थिति बदलकर यह दिखाया गया कि नायिका अपने नायक से दूर है और खतों के लेन-देन के जरिए यह गीत सामने आता है।
गीतकार इंदीवर ने कल्याणजी के सिटिंग रूम में बैठकर ही गाने के अंतरे लिख डाले। उस दिन सभी मूड में थे इसलिए कल्याणजी ने शब्दों में थोड़ा-सा बदलाव करके पूरा गाना कंपोज कर दिया। इसे सुनकर निर्देशक गोविंद सरैया बेहद उत्साहित हो गए और उन्होंने तुरंत इस गाने को रिकॉर्ड करने का पैâसला कर लिया। उसी दिन यह तय हो गया कि गाना लता मंगेशकर और मुकेश की आवाज में रिकॉर्ड किया जाएगा। एक हफ्ते के भीतर फिल्म के तीन गाने रिकॉर्ड कर लिए गए, जिनमें से एक ‘चंदन सा बदन’ दो भागों—पुरुष और महिला रूप में रिकॉर्ड किया गया। फिल्म रिलीज होने के बाद उस दौर के प्रेमी और प्रेमिकाएं अपने प्रेम पत्रों के साथ गुलाब का फूल भेजना नहीं भूलते थे और यह उस समय का एक चलन बन गया था।
७० के दशक में गोविंद सरैया ने सरस्वतीचंद्र का रीमेक संजीव कुमार के साथ बनाने की योजना बनाई, लेकिन बात नहीं बन सकी। बाद में उन्होंने इसका गुजराती रीमेक फिल्म गुण सुंदरी नो घर संसार नाम से बनाया, जिसमें संजीव कुमार के भाई किशोर जरीवाला ने मुख्य भूमिका निभाई थी!
