राजन पारकर
किसान जब खेत में पसीना बहाता है तो उसकी फसल पर मौसम की मार पड़ती है, लेकिन जब वही किसान कर्ज में डूबता है तो उसकी उम्मीदें सरकारी फाइलों के सूखे पन्नों में अटक जाती हैं। अब जब आंदोलन की आग पंढरपुर तक पहुंची है तो सरकार के नियमों में बदलाव की चर्चा शुरू हो गई है। राजनीति का यह भी कमाल है- जो मांग कल तक असंभव थी, आज वही ‘चर्चा योग्य’ बन जाती है। रोहित पवार के अन्नत्याग आंदोलन के बाद सरकार की तरफ से बातचीत के संकेत मिलने लगे हैं। मंत्री गिरीश महाजन के आंदोलन स्थल पर पहुंचने की खबरों के बीच सवाल यही है कि क्या किसान की पुकार सच में सुनी जाएगी या फिर आश्वासनों की पुरानी पोटली खोलकर फिर से बंद कर दी जाएगी?
‘बीड की राजनीति में रिश्तों के नाम पर राजनीति या राजनीति के नाम पर रिश्ते?’
बीड की धरती पर सियासत हमेशा गर्म रहती है। अब आमदार प्रकाश सोलंके के आरोपों ने वहां की राजनीतिक भट्ठी को फिर हवा दे दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि परली के भाई-बहन ने उनके खिलाफ षड्यंत्र रचा। चुनावी मैदान में जब जाति, समीकरण और रणनीति के मोहरे सजते हैं, तब लोकतंत्र कई बार शतरंज की बिसात जैसा नजर आता है। आरोप लगते हैं, सफाइयां आती हैं और जनता तमाशा देखती है कि असली खिलाड़ी कौन और प्यादा कौन? बीड की राजनीति में पुराने हिसाब-किताब फिर खुल रहे हैं। यहां हर बयान के पीछे एक कहानी और हर खामोशी के पीछे एक रणनीति खोजी जा रही है।
‘आंकड़ों की चमक और सवालों की धुंध : विकास के दावों पर फिर उठे प्रश्नचिह्न’
पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए अर्थव्यवस्था, कृषि, ऑपरेशन सिंदूर और पहलगाम हमले की जांच जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए हैं। राजनीति में आंकड़े भी बड़े कलाकार होते हैं- सत्ता में हों तो उपलब्धि का आईना दिखाते हैं और विपक्ष में आते ही वही आंकड़े सवालों का कटघरा बन जाते हैं। देश की अर्थव्यवस्था, किसानों की हालत और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर विषयों पर राजनीति की गर्मी बढ़ती जा रही है। सवाल यह है कि जनता को भाषणों की चमक चाहिए या जमीन पर बदलाव की रोशनी? लोकतंत्र का बाजार भी बड़ा अजब है। यहां किसान की आंखों का पानी भी मुद्दा बनता है और नेताओं के शब्दों का तूफान भी। कर्ज में किसान हो या कुर्सी बचाने की चिंता में नेता-दोनों अपनी-अपनी किश्तें चुका रहे हैं। एक तरफ खेत सूखा है, दूसरी तरफ बयानबाजी की फसल लहलहा रही है। एक तरफ किसान नियम बदलने की मांग कर रहा है, दूसरी तरफ नेता एक-दूसरे के राजनीतिक समीकरण बदलने में लगे हैं। जनता पूछ रही है- ‘साहब, कर्जमाफी होगी या सिर्फ वादों की माफी? क्योंकि इस देश में कई बार फाइलें चलती हैं, सरकारें बदलती हैं, भाषण बदलते हैं… लेकिन किसान की किस्मत वही पुरानी कहानी सुनाती रहती है!
