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सुबह के चार बजे तलोजा सेक्टर-१२ की चॉल के बाहर लोहे के ड्रमों की आवाज गूंज उठी। पानी कटौती का पांचवां हफ्ता था…
रुक्मिणी ने मुड़कर देखा, जहां १०० मेगावाट का नया हाइपरस्केल डेटा सेंटर खड़ा था। उसके पोते आरव ने अखबार में पढ़ा था कि ये सेंटर सर्वर को ठंडा रखने के लिए हर दिन लाखों लीटर पानी का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि कंपनियां कहती हैं कि वे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का रीसाइकल्ड पानी इस्तेमाल करती हैं, लेकिन रुक्मिणी को लगता है कि अगर प्रशासन यही मुस्तैदी और इंप्रâास्ट्रक्चर उनके चॉल तक पानी पहुंचाने में दिखाता और अपनाता, तो आज यह नौबत न आती।
दोपहर को पारा ३९ डिग्री छू गया। ऐरोली और घनसोली में भी कटौती थी। तलोजा एमआईडीसी की केमिकल फैक्ट्रियों और उद्योगों से निकलने वाले धुएं के कारण हवा में झ्श्२.५ का स्तर मानकों से तीन गुना ज्यादा था, जिससे आरव को सूखी खांसी थी। शाम को जब पाटील काका ने बात उठाई, तो पता चला कि डेटा सेंटर्स को ‘अत्यावश्यक सेवा’ का दर्जा प्राप्त है। नीतिगत प्राथमिकता स्पष्ट थी, शहर का ढांचा डिजिटल इकोनॉमी को संभालने के लिए पहले प्रतिबद्ध था, आम नागरिक उसके बाद आते थे।
रात को जब ग्रिड पर दबाव बढ़ने से स्थानीय चॉल की बत्ती गुल हुई, तो डेटा सेंटर अपने बैकअप सिस्टम के कारण नीली लाइटों में जगमगाता रहा। उसके विशाल जनरेटरों की गड़गड़ाहट हवा में गूंज रही थी। कंपनियों के पास ‘वॉटर पॉजिटिव’ के सर्टिफिकेट थे, लेकिन जमीनी हकीकत यह थी कि विकास की इस दौड़ में संसाधनों का झुकाव इंसानों से ज्यादा मशीनों की तरफ हो चुका था।
डेटा सेंटर सीधे तौर पर गरीब का पीने का पानी ‘छीन’ नहीं रहे हैं, बल्कि संसाधनों के असमान वितरण का कारण बन रहे हैं, जहां राज्य प्रशासन आम नागरिकों की बुनियादी जरूरतों (पानी-बिजली) से पहले इन तकनीकी महाकाय कॉर्पोरेट्स को ‘अप टाइम’ की गारंटी देने में व्यस्त है।
मशीनों को प्राथमिकता, इंसान इंतजार में!
विशेषज्ञों का मानना है कि डेटा सेंटर सीधे संसाधन नहीं छीनते, लेकिन नीतिगत प्राथमिकताओं के कारण पानी और बिजली का ढांचा पहले डिजिटल अर्थव्यवस्था की जरूरतों के अनुसार तैयार किया जा रहा है। ऐसे में आम नागरिकों की बुनियादी जरूरतें पीछे छूटने का खतरा लगातार बढ़ रहा है।
