मुख्यपृष्ठस्तंभविजय-विमर्श: एआई का असली संकट जब केवल मशीनें सोचने लगेंगी

विजय-विमर्श: एआई का असली संकट जब केवल मशीनें सोचने लगेंगी

विजयशंकर चतुर्वेदी

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को लेकर दुनिया में सबसे बड़ी बहस नौकरियों पर उसके प्रभाव को लेकर चल रही है। आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं कि मशीनें मनुष्यों का काम छीन लेंगी, कार्यालयों में कर्मचारियों की आवश्यकता कम हो जाएगी और अनेक पेशे अप्रासंगिक हो जाएंगे। यह चिंता पूरी तरह निराधार नहीं है, लेकिन वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या एआई के बढ़ते उपयोग के साथ मनुष्य अपनी निर्णय क्षमता, विश्लेषण कौशल और स्वतंत्र चिंतन की आदत भी खो देगा? यदि ऐसा हुआ तो यह मानव सभ्यता के बौद्धिक भविष्य का अभूतपूर्व संकट बन जाएगा।
एआई का विस्तार और बदलता कार्य-संसार
एआई अब भविष्य की तकनीक नहीं, वर्तमान की वास्तविकता है। भारत आज दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां कार्यस्थलों पर एआई का उपयोग सबसे तेजी से बढ़ रहा है। हाल के सर्वेक्षणों के अनुसार, भारत में बड़ी संख्या में कर्मचारी अपने दैनिक कार्यों के लिए एआई आधारित उपकरणों का उपयोग कर रहे हैं। कंपनियां भी उत्पादकता बढ़ाने के लिए एआई में भारी निवेश कर रही हैं। कारण यह है कि एआई दस्तावेज तैयार कर सकती है, डेटा का विश्लेषण कर सकती है, अनुवाद कर सकती है, कोड लिख सकती है, कानूनी मदद कर सकती है, व्यवसाय के चरणों को स्वयंचालित कर सकती है तथा जटिल व विशाल सूचनाओं को कुछ ही क्षणों में व्यवस्थित कर सकती है। इससे समय की बचत होती है और अनेक कार्य अधिक कुशलता से संपन्न होते हैं। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब सुविधा धीरे-धीरे निर्भरता में बदलने लगती है।
सुविधा से निर्भरता तक का सफर
एआई पहली ऐसी तकनीक है जो शारीरिक श्रम के साथ-साथ बौद्धिक श्रम को भी प्रभावित कर रही है। आज छात्र निबंध लिखने के लिए एआई का सहारा लेते हैं, कर्मचारी रिपोर्ट तैयार करने के लिए, और कई प्रबंधक निर्णय संबंधी प्रारंभिक विश्लेषण के लिए भी एआई पर निर्भर होने लगे हैं। इसका असल खतरा यह है कि मनुष्य प्रश्न पूछना कम कर देगा। जब कोई व्यक्ति लगातार तैयार उत्तर प्राप्त करता है तो उसके भीतर तर्क गढ़ने, तथ्य परखने और वैकल्पिक दृष्टिकोण खोजने की क्षमता धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जाती है। सब कुछ पकापकाया खाने की आदत लग जाती है। कई अध्ययनों में यह चिंता व्यक्त की गई है कि एआई के बढ़ते उपयोग के साथ सत्यापन, आलोचनात्मक चिंतन और स्वतंत्र निर्णय की भूमिका घट सकती है, विशेषकर तब जब उपयोगकर्ता मशीन द्वारा दिए गए उत्तरों को ही अंतिम सत्य मानने लगें।
‘लोकतंत्र और समाज के लिए नई चुनौती
लोकतंत्र की शक्ति जागरूक और विचारशील नागरिकों में निहित होती है। यदि नागरिक जानकारी प्राप्त करके उसका स्वतंत्र मूल्यांकन न करें, तो लोकतांत्रिक विमर्श क्षीण हो जाएगा। सोशल मीडिया ने पहले ही सूचनाओं का अंबार लगा रखा है; एआई इस बाढ़ को और अधिक तीव्र व भ्रामक बना सकती है। हकीकत यह है कि वैâरियर के सुझाव, घरेलू जिंदगी के निजी निर्णय, समाचारों के सारांश, राजनीतिक विश्लेषण, निवेश सलाह और सामाजिक मत- सब कुछ एल्गोरिद्म द्वारा तैयार हो रहा है। ऐसी स्थिति में यह और भी आवश्यक हो जाता है कि मनुष्य केवल सूचना का उपभोक्ता न रहे, बल्कि उसका परीक्षक भी बना रहे। क्योंकि तकनीक निर्णय में सहायता तो कर सकती है, सचेत निर्णय का स्थान नहीं ले सकती।
निर्भरता नहीं, एआई साक्षरता जरूरी
एआई का उत्तर एआई का विरोध नहीं है। हमें एआई का उपयोग सहायक उपकरण की तरह करना चाहिए, मुख्य विकल्प के रूप में नहीं। संस्थानों को चाहिए कि वे सिर्फ एआई के उपयोग न सिखाएं, बल्कि यह भी बताएं कि एआई के उत्तरों की जांच कैसे की जाए, उनसे असहमति कैसे व्यक्त की जाए और स्वतंत्र निष्कर्ष कैसे निकाले जाएं। भविष्य में सबसे मूल्यवान व्यक्ति वह होगा जो एआई द्वारा उपलब्ध कराई गई सूचनाओं का विवेकपूर्ण मूल्यांकन कर सके। मशीनें जानकारी दे सकती हैं, परंतु बुद्धिमत्ता, नैतिक निर्णय और दूरदृष्टि अभी भी मनुष्य की ही विशेषताएं हैं। एआई का युग मानव क्षमता को बढ़ाने का अवसर तभी बन सकता है, जब हम अपनी बौद्धिक मांसपेशियों का उपयोग करेंगे। अन्यथा इतिहास में पहली बार ऐसी तकनीक बन चुकी होगी, जो सोचने में हमारी सहायता करते-करते हमें स्वयं सोचने से ही दूर कर देगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, कवि-लेखक। सामाजिक मुद्दों, सार्वजनिक नीति और भू-राजनीतिक विषयों पर नियमित लेखन।)

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