मजबूरी का हर कोई फायदा उठा रहा है आजकल,
लबों पे मुस्कान, दिल में शैतान बसा रहा है आजकल।
कहें किससे दिल के शिकवे-शिकायत अपने,
वक़्त कहां है किसी के पास किसी के लिए आजकल।
अपना समझने की भूल के इंद्रजाल में उलझा है इंसान,
दूसरों से काम निकलवाने के ढंग हैं सबके अपने-अपने।
हमदर्द तो क्या बनते किसी के मर्ज़ का,
मर्ज़ दूसरों का बढ़ाकर मुस्कुरा रहे हैं लोग आजकल।
मजबूरी का हर कोई फ़ायदा उठा रहा है आजकल,
चेहरे पे हँसी, दिल में ज़हर छुपा है आजकल।
अपनों के भ्रम में इंसान उलझा हुआ है इस कदर,
मतलब निकलते ही बदल रहा है हर चेहरा आजकल।
हमदर्दी की उम्मीद भी किससे करें दुनिया में,
दूसरों के ज़ख्म बढ़ाकर मुस्कुरा रहे हैं लोग आजकल।
मुनीष भाटिया
ऐरो सिटी,
मोहाली
