राजन पारकर
‘घोषणाओं की बारिश में समस्याओं की सूखी जमीन… महाराष्ट्र का राजनीतिक तमाशा!’
महाराष्ट्र की राजनीति का रंगमंच फिर सज चुका है। पर्दे पर वही पुराने कलाकार, हाथ में नई-नई घोषणाओं की पोटली और जनता के हिस्से में वही पुराना सवाल- ‘साहब, भाषण मिलेगा या समाधान?’ एक तरफ किसान खेत में खड़ा होकर आसमान देख रहा है और दूसरी तरफ नेता विधानसभा में एक-दूसरे की तरफ। फर्क इतना है कि किसान बादल खोज रहा है और नेता मुद्दे!
…‘कर्जमाफी की मिठाई, लेकिन किसान की थाली खाली!’
सरकार कह रही है- हमने दो लाख तक की कर्जमाफी कर दी। वाह! घोषणा की थाली में मिठाई तो रख दी गई, मगर किसान पूछ रहा है- ‘साहब, मेरे अनाज का भाव कहां है?’ किसान को कर्ज से ज्यादा चिंता अपनी फसल की कीमत की है। खेत में मेहनत करनेवाला किसान आज भी बाजार के दरवाजे पर खड़ा है, जहां भाव तय होते हैं, लेकिन उसकी मेहनत की कीमत नहीं।
कहा जा रहा है कि पहले भी कर्जमाफी हुई थी और शिकायतें नहीं आई थीं। मगर आज सवाल सिर्फ कर्ज का नहीं है- सवाल उस व्यवस्था का है जहां किसान पैदा करता है, लेकिन फैसला कोई और करता है। सरकार के भाषणों में किसान ‘अन्नदाता’ है, मगर मंडी में वही किसान ‘भाव पूछने वाला’ बन जाता है।
…‘पानी का संकट, भ्रष्टाचार का मानसून और सरकार की छतरी!’
महाराष्ट्र में अल नीनो का खतरा बताया गया। पानी की चिंता जताई गई। लेकिन सवाल वही- जब सूखे का बादल दिखाई दे रहा था तो तैयारी की छतरी कहां थी? जलसंकट आने से पहले टैंकर तैयार हो जाते हैं मगर योजना क्यों नहीं? कामों के बिल अटकते हैं, घोषणाओं की गाड़ी दौड़ती है। कहीं सड़कें अधूरी, कहीं योजनाओं के भुगतान बाकी और कहीं जनता को आश्वासन की नई बोतल!
‘लाडकी बहन योजना या चुनावी बहनापे का अध्याय?’
बहनों के नाम पर योजना आई, तालियां बजीं, फोटो खिंचे, भाषण हुए। फिर आया केवाईसी का डंडा और लाखों नाम बाहर! अब जनता पूछ रही है- अगर योजना इतनी ही मजबूत थी तो लाखों बहनें अचानक गलत कैसे हो गर्इं? चुनाव के समय रिश्ते बड़े प्यारे हो जाते हैं। वोट की स्याही सूखते ही रिश्तों की जांच शुरू हो जाती है। राजनीति में ‘बहन’ शब्द बहुत मीठा है, लेकिन सवाल यह है कि इस मिठास में कितनी नीति है और कितना वोटों का गुड़?
…‘सात करोड़ कर्मचारियों के खाते में उम्मीद का ब्याज!’
राजनीतिक हंगामे के बीच कर्मचारियों के लिए पीएफ ब्याज की खबर आई। ८.२५ प्रतिशत ब्याज की मंजूरी सुनकर कर्मचारी ने सोचा- चलो, कम से कम मेहनत की कमाई पर तो कुछ मिलेगा! डिजिटल सुविधा, एटीएम, यूपीआई जैसी बातें सुनने में अच्छी लगती हैं। बस अब यही उम्मीद है कि सुविधा की रफ्तार इतनी तेज हो कि फाइलें दौड़ें नहीं, काम हो जाए। महाराष्ट्र की कहानी भी कमाल की है। किसान को भाव चाहिए, बहन को भरोसा चाहिए, कर्मचारी को उसका पैसा चाहिए…
और सरकार को चाहिए… तालियां!
लोकतंत्र का असली मंच वही है जहां जनता दर्शक नहीं, मालिक होती है। वरना हर पांच साल बाद वही पुराना नाटक, वही नए पोस्टर और वही पुरानी कहानी दोहराई जाती रहेगी ‘घोषणाओं के मेले में जनता का सवाल, किसान रो रहा है, बहन पूछ रही है और कर्मचारी इंतजार कर रहा है!’
